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जहां-चाहां पैर पड़े ‘संतन’ के..

चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी की काट के तौर पर नरन्द्र मोदी का नाम उछालने को लेकर अब भाजपा में आरोप प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। पार्टी के अंदर ही मोदी को लेकर नेता मुखर होने लगे हैं। आडवाणी के नजदीकी रणनीतिकार चंदन मित्रा तो यहां तक कह रहे हैं कि चुनाव के दौरान मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिये उछाले जाने से काफी नुकसान हुआ। यही नहीं दिलचस्प बात यह भी है कि चुनाव अभियान के दौरान मोदी ने देश में 200 लोकसभा क्षेत्रों में जनसभाएं कीं। इसमें गुजरात के बाहर सिर्फ 18 सीटों पर ही पार्टी उम्मीदवारों को सफलता मिली। गौरतलब है कि मोदी गोवा और महाराष्ट्र के भी चुनाव प्रभारी थे, जहां भाजपा का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। विपरीत इसके राहुल गांधी ने देश में लगभग सौ लोकसभा क्षेत्रों में सभाएं कीं और 50 सीटों में कांग्रेस उम्मीदवारों को सफलता मिली। जिस भाषा का नरंद्र मोदी ने इस्तेमाल किया वह सदियों पुरानी थी। उसे यंग इंडिया ने अस्वीकार कर दिया। वे राहुल गांधी के सामने विदूषक की तरह ही नजर आये। मोदी विकास पुरुष के रूप में लोगों के बीच मुखातिब होने की कोशिश करते रहे, लेकिन उन्हें उस रूप में किसी ने नहीं स्वीकारा। अंतत: पूर चुनाव अभियान में उन्हें अपना बड़बोला हिन्दुत्व का एजेन्डा ही रखना पड़ा। बुढ़िया, गुड़िया और दोयम दर्जें की तुकबंदी वाले भाषणों में भविष्य का सपना और योजनाएं नदारद थीं। वहीं राहुल गांधी यंग इंडिया की भाषा बोलते रहे और लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया। अब पार्टी में मोदी को आगे रखकर जोशी, जसवंत, सुषमा जसे नेताओं को हाशिए पर डालने के लिये साइबर और मीडिया में सक्रिय नेता कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस मुहिम को पार्टी के दिग्गज नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि तीस साल पहले आडवाणी ने जिस युवा टीम, जिसमें प्रमोद महाजन, अरुण जेतली, अनंत कुमार, सुषमा स्वराज,नरन्द्र मोदी, वेंकैया नायडू को आगे किया था, उसके बाद पार्टी में युवाओं को आगे नहीं बढ़ाया गया। अब युवा नेता के नाम पर साठ के आसपास नेता की जमात ही पार्टी के पास है। ऐसे में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की चुनौती से पार्टी को निपटने में पसीने छूट रहे हैं।

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