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रोयें या हंसें, करं हम क्या करं..

लोकसभा का चुनाव परिणाम झारखंड में दो राष्ट्रीय दलों के लिए विचित्र स्थिति पैदा कर रहा है। भाजपा शानदार जीत हासिल करने के बाद भी खुश नहीं हो पा रही है। न खुलकर जश्न मना पा रही है, न कार्यकर्ताओं में उत्साह दिख रहा है। इधर कांग्रेस झारखंड में करारी हार के बाद हताश है, लेकिन देश भर में पार्टी की शानदार जीत देखकर खुश हो रही है। छह में पांच सीटें गंवाना कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा झटका है। झारखंड में भाजपा के लिए यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि चौदह में से आठ सीटें जीतकर 2004 के चुनाव परिणाम का बदला ले लिया। पांच साल के लंबे अंतराल के बाद भाजपा को यहां जीत का स्वाद मिला। 2005 के बाद राज्य में जितने उपचुनाव हुए, भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा के तीन तथा विधानसभा के चार उपचुनाव हुए। भाजपा कोई चुनाव नहीं जीत सकी। इन पांच सालों के अंतराल में दल के अंदर कई उठा-पटक, सांगठनिक फेर-बदल होते रहे। कई चुनौतियों से जूझते हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया। हालांकि टिकट बंटने के बाद भी विरोध के स्वर मुखरित हुए थे, लेकिन समय के साथ लोग इस बिसर गये। भाजपा ने अपेक्षा के अनुरूप अच्छी जीत हासिल की। लेकिन देश भर में भाजपा को आयी कम सीटें और खराब प्रदर्शन ने झारखंड के भाजपाइयों को भी निराश कर दिया। सीटों के लिहाज से देखें तो झारखंड में सर्वाधिक नुकसान कांग्रेस को ही हुआ है। 2004 में कांग्रेस को सबसे अधिक छह सीटें थीं। खूंटी, लोहरदगा, सिंहभूम, धनबाद और गोड्डा ये पांचों सीटें हाथ से निकल गयीं। रांची की एकमात्र सीट बच पायी। इस निराशाजनक प्रदर्शन पर कांग्रेस कैसे इतराये? झारखंड में नेतृत्व को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं, होने भी चाहिए। वजह भी जायज है कि कांग्रेस ने देश में बेहतर प्रदर्शन किया। लेकिन झारखंड में इतनी करारी हार क्यों हुई? इसकी कौन-कौन सी वजह हो सकती है? यहां पिछले दो साल से यूपीए समर्थित सरकार रही। छह महीने से राष्ट्रपति शासन है। दावा यह कि यहां विकास के बेहतर काम हुए। तब क्या एंटी इनकंबेंसी फैक्टर की वजह से कांग्रेस की यह दुर्दशा हुई। यदि नहीं तो इसका मतलब है कि संगठन के अंदर की खामियों और ठोस रणनीति के अभाव से कांग्रेस की हार हुई है। अब इस परिस्थिति में कांग्रेस कैसे खुश हो। लेकिन अभी वह खुश इसलिए है कि केंद्र में उसकी सरकार बन रही है।

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