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निशाने पर लाहौर

लाहौर की पुलिस अकादमी पर आतंकी हमले के बारे में पाकिस्तान और भारत की राजनयिक बयानबाजी से अलग, साफ लग रहा है कि आतंकी लोकतांत्रिक प्रशासन और आधुनिकता की संस्कृति को पस्त और ध्वस्त कर देना चाहते हैं। वे यह बता देना चाहते हैं कि पुलिस और नागरिक प्रशासन उनका मुकाबला नहीं कर सकते क्योंकि उनका प्रशिक्षण और हथियार सेना के ही टक्कर के हैं। उनकी सांस्कृतिक कल्पना में लाहौर जसे उस शहर के लिए कोई जगह नहीं है, जो आधुनिक शिक्षा, कला, संस्कृति, फिल्म और मीडिया का केंद्र हो और जहां के बाजार में स्त्री-पुरुष रात को भी बेधड़क घूम सकें। वे उस नागरिक समाज को भी आतंकित करना चाहते हैं कि जो मुंबई से लेकर पेशावर और लाहौर तक हुए हर आतंकी हमले का विरोध करता है और भारत-पाक के बीच अमन का रिश्ता कायम करने का हिमायती है। तो क्या इसका यही अर्थ लिया जाए कि पाकिस्तान को अब सेना ही संभाल सकती है और राष्ट्रपति जरदारी के नेतृत्व में बहाल हुआ लोकतंत्र फिर सेना के अस्पताल में आराम करना चाहता है? या फिर यह समझा जाए कि हमलों की एसी पटकथाएं सेना की सहमति से ही तैयार की जा रही हैं? हालांकि पाकिस्तान के नाकाम, लेकिन बयानबाजी में चतुर आंतरिक सुरक्षा मंत्री रहमान मलिक ने भारत से राजनयिक खेल खेलते हुए इसकी तुलना मुंबई हमले से कर दी है तो विदेश मंत्री गौहर अयूब ने इसे श्रीलंका के क्रिकेट खिलाड़ियों पर हुए हमले जसा कहा है। जाहिर है भारत को इस राजनय का जवाब देना था और गृहमंत्री चिदंबरम ने हमले पर अफसोस जाहिर करते हुए साफ कहा है कि उसकी मुंबई हमलों से तुलना नहीं हो सकती, क्योंकि मुंबई हमले का स्रेत पाकिस्तान था, यह तो पता है, पर लाहौर के बार में कोई जानकारी नहीं है। स्पष्ट है लाहौर और मुंबई दोनों हमलों का स्रेत उन नीतियों में है, जो पिछले तीस सालों से अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अपनाई जा रही हैं और जिनका समाधान उनमें नहीं है। सवाल है कि क्या लगातार उलझती जा रही इस गुत्थी का समाधान ओबामा प्रशासन के नए पैकेा में है? जाहिर है कि अमेरिका को भी विश्वास नहीं है कि सिर्फ अफगानिस्तान में नई कुमुक भेज देने और पाकिस्तान को पांच साल तक भारी इमदाद दे देने से इसका हल होगा। इसीलिए आतंकवाद की काट में ज्यादा से ज्यादा देशों को शामिल किया जा रहा है ताकि अनेक पक्षीय सुलह-सफाई का क्रम बने और शांति की नई उम्मीद पैदा हो सके।

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  • Web Title: निशाने पर लाहौर