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राजरंग

अब मौजा ही मौजा..ड्ढr भइया, जो बेचैनी 16 अप्रैल से शुरू हुई थी, वह जाकर एक महीने बाद खत्म हुई है। देर तक पीछे चलने के बाद भी सुंदर बुद्धि वाले भइया को उम्मीद थी कि पिछली बार की तरह इस बार भी बाजी पलटेगी। लेकिन जब तक फैसला सामने नहीं आ जाये, तब तक बड़े से बड़े अखाड़ेबाज अबीर गुलाल नहीं उड़ा सकते। भइया के प्रतिद्वंद्वी चौधरी साहब जब आगे थे तब उनसे कार्यकता पूछते हैं सर विजय जुलूस की तैयारी करं। तब चौधरी साहब दृढ़ नहीं थे। भइया एक महीना से रात में ढंग से सो नहीं पाये। भोजन पानी भी ठीक से गले से नहीं उतर रहा था। करवट बदल-बदल कर लंबे समय से रात गुजर रही थी। अंत में भइया जीत ही गये। ऐसा जीते कि अकेले रह गये। इकलौते की जो पूछ होती है, वहीं महत्व अब भइया को मिलेगा। भइया से अधिक भयवन खुश। कम से क म एक महीने तक पार्टियों का दौर चलेगा। अब तो भइया सेंटर में बड़का पद भी पायेंगे। अब तो चांदी ही चांदी रहेगी। पहले हार की संभावना से नहीं सो पा रहे थे अब जीत की खुशी में नींद उड़ेगी।

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