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लाइन से आओ

उस दिन मैं ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू कराने वालों की लाइन में खड़ा था कि एक नौजवान लाइन तोड़ कर सबसे आगे आ गया। लोगों ने शोर मचाया। कोई बोल उठा : ‘अरे, डॉ. मनमामेहन सिंह पिछले दिनों वोट डालने पहुंचे तो उन्हें भी लाइन में खड़े होना पड़ा था।’ नौजवान ने तपाक से कहा : ‘अगर मैं प्रधानमंत्री बन गया तो मैं भी लाइन में खड़ा हो जाऊंगा।’ उस कम-अक्ल नौजवान को शायद मालूम नहीं था कि पीएम पद के दावेदारों की लाइन इस लाइन से कहीं ज्यादा बड़ी थी, इतनी लम्बी कि यदि सभी को एक-एक महीने के लिए प्रधानमंत्री बना दिया जाता तो पांच साल बाद कई उम्मीदवार हाथ मलते रह जाते। कुछ तो यह भी कह डालते कि जब तक सबका नंबर नहीं आ जाता संविधान संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया जाना चाहिए। किसी भी लाइन में लगे लोग च्युंगम की तरह उम्मीद को चबाते रहते हैं कि मेरी बारी आने पर काम बन जाएगा। लेकिन यह जरूरी तो नहीं है। मेरे साथ अकसर ऐसा हुआ है कि मेरा नम्बर आने पर खिड़की बंद हो गई या बस कंडक्टर ने कह दिया : ‘बस, और नहीं। अगली बस में आना।’ और जहां दो लाइनें हैं, वहां मैं जरा छोटी लाइन में खड़ा हो जाता हूं। लेकिन यह लाइन सरकने का नाम ही नहीं लेती। छोटी बड़ी हो जाती है। लाइन में लगना अनुशासन है, कायदा-कानून भी है, अच्छे नागरिक की निशानी। मगर लाइन तोड़ने वालों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि रेस इंसानों की हो या घोड़ों की, शुरू में सबको लाइन में ही लगना पड़ता है और ‘फायर’ होने पर हर किसी को एक दूसरे से आगे निकलना होता है। जो जीता वही सिकन्दर। और ऐसा भी होता है कि जो व्यक्ित लाइन में नहीं है, वह दूसरों को लाइन तोड़ने के लिए उकसाता रहता है। हाल ही के चुनावों के दौरान कुछ नेताओं ने बार-बार पूछा कि ‘उस खतरनाक आतंकवादी को फांसी क्यों नहीं देते?’ उन्हें बताया गया कि उसके आगे दो दर्जन मुजरिम लाइन में हैं, कानून के अनुसार, बारी आने पर ही..। बात-बात में कानून छांटने वाले नेताओं ने कहा : ‘कैसी लाइन? कैसा कानून?’ अब इन लोगों को कौन समझाए कि आज की दुनिया में सजा पाने के लिए ही नहीं, जुर्म करने के लिए भी कहीं-कहीं लाइन में लगना पड़ता है। कहते हैं कि एक अफ्रीकी देश में एक आदमी एक रात गोला-बारूद लेकर तानाशाह के महल में जा पहुंचा। पहरेदारों ने पूछा तो उसने कहा: ‘मैं इस महल को उड़ाने आया हूं।’ एक गार्ड बोला : ‘उधर, उस तरफ लगी लाइन में खड़े हो जाओ।’

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