DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आर्थिक मंदी : वैश्विक गांव में संरक्षण की दीवारें

इस समय पूरी दुनिया विकसित देशों के द्वारा एक ओर वैश्विक मंच पर संरक्षणवादी नीतियों को न अपनाने के संकल्प तथा दूसरी ओर तेज संरक्षणवादी कदमों के नीतिगत निर्णयों के विरोधाभासी कदमों को आश्चर्य के साथ देख रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने विदेशों से आउटसोर्सिग करने वाली कंपनियों को टैक्स रियायतों का लाभ नहीं देने की अपनी आउटसोर्सिग विरोधी नीति में कहा है कि अब बंगलुरु जैसी जगहों पर रोजगार सृजन करने वाली अमेरिकी कंपनियों को वर्षो से मिल रही कर रियायतें खत्म की जाएंगी। ये रियायतें अब उन कंपनियों को मिलेंगी, जो अमेरिका में बफॉलो जैसे शहरों में रोजगार का सृजन करेंगी। अमेरिका के ऐसे निर्णय से भारत जैसे देशों पर इसका बहुत प्रतिकूल असर पड़ेगा, जहाँ पर लाखों लोग आउटसोर्सिग के जरिए अपनी आजीविका चला रहे हैं। इसी तरह अप्रैल 200में भारतीय आईटी पेशेवरों में खासे लोकप्रिय अमेरिका के एच१बी और एल१ वीजा कार्यक्रमों में सुधार के लिए अमेरिका की संसद के ऊपरी सदन सीनेट में एक विधेयक पेश किया गया है। इस विधेयक के तहत प्रस्ताव है कि कोई भी अमेरिकी कंपनी जो एच१बी वीजाधारक को नौकरी पर रखना चाहेगी, उसे पहले उस पद पर किसी योग्य अमेरिकी को रखने के लिए हरसंभव प्रयास करने होंगे। साथ ही कोई भी कंपनी किसी योग्य अमेरिकी के स्थान पर एच१बी वीजाधारक को नियुक्त नहीं कर सकेगी। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तो इसका भारतीय पेशेवरों पर सबसे ज्यादा प्रतिकूल असर पड़ेगा। सबसे अधिक ऐसे वीजा भारतीय पेशेवर ही हासिल करते हैं। यकीनन सितंबर 2008 से लगातार तेज हो रहे आर्थिक मंदी के थपेड़ों से अपनी ढहती हुई अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए विकसित देशों के द्वारा जो कदम उठाए गए हैं, उन्होंने दुनिया को गैर-वैश्वीकरण के दौर में ढकेल दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन सहित दुनिया के कई देश अपने डूबते हुए उद्योग, व्यापार और रोजगार को बचाने के लिए भारी सब्सिडी के साथ-साथ नौकरियों में भी स्थानीय लोगों को संरक्षण देने का रास्ता अपना रहे हैं। खासतौर से विकसित देशों के द्वारा विकासशील देशों के सामानों, लोगों तथा सेवाओं की आवाजाही के संबंध में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में रफ्तार पैदा करने के लिए ओबामा सरकार के 00 अरब डॉलर के राहत पैकेज ने वैश्वीकरण के समक्ष गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं। अमेरिकी वस्तुओं को खरीदने पर बल देने की नीति से दुनियाभर में खुली अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न हो गई हैं। कहा जा रहा है कि ओबामा के पहले बजट में भारी सब्सिडी के कारण करीब 1.7५ खबर डॉलर का घाटा होगा, जो अमेरिका का द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद का सबसे बड़ा घाटा होगा। यूरोपीय समुदाय से जुड़े 27 देशों ने भी वैश्विक मंदी से निपटने के लिए संरक्षणवाद को हवा दे दी है। विभिन्न वस्तुओं के स्वतंत्र आवागमन तथा श्रमबल को रोकने के लिए जिस तरह से प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, उसके कारण भारत सहित विकासशील देशों को काफी नुकसान हो रहा है। अक्टूबर 2008 से फरवरी 200तक विदेशों में काम कर रहे करीब 20 हजार भारतीय नौकरी गंवाने के बाद स्वदेश लौट आए हैं। दुनिया के विकासशील देश गेट और फिर डब्ल्यूटीओ जैसे वैश्विक संगठनों की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे थे कि इन वैश्विक संगठनों से उनके विकास को नई दिशाएँ मिेंगी, ेकिन अब विकासशी देश अपने को ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। ये देश देख रहे हैं कि वैश्विक नियमों के पालन के मद्देनजर उन्होंने जिन विकसित देशों के लिए अपने बाजारों को खोल दिया, वे ही विकसित देश संरक्षणवादी नीतियों के तहत विकासशील देशों के लिए अपने बाजारों को बंद कर रहे हैं। ये देश देख रहे हैं कि अब दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक कारोबार की संभावना घट गई है। ये देश देख रहे हैं कि दुनिया में पूँजी का प्रवाह सीमित हो गया है। ये तीन प्रमुख कारण वैश्वीकरण की दिशा को उलटते हुए दिखाई दे रहे हैं। हमें वैश्विक गाँव में संरक्षण की दीवारों के खतरों को समझना होगा। दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ एक मत से यह बात कह रहे हैं कि वैश्विक आर्थिक संकट में किसी भी देश के द्वारा डब्ल्यूटीओ के नियमों के विपरित निजी हित साधना अनुपयुक्त है। ढहते हुए वैश्वीकरण की चुनौतियों के बीच भारत, चीन, ब्राजील आदि प्रभावपूर्ण देशों के द्वारा यह जोरदार आवाज उठानी होगी कि विकसित देशों के द्वारा अपने उद्योग-कारोबार को नियमों के विपरित भारी सब्सिडी देना और आउटसोर्सिग जैसी सेवाओं की राह में अड़चनें निर्मित करना उपयुक्त नहीं है। लेखक वित्त मामलों के जानकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: आर्थिक मंदी : वैश्विक गांव में संरक्षण की दीवारें