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पार्टी ही नहीं दूसरे वामपंथी भी घेरेंगे करात को

संसदीय चुनाव में वामदलों की सबसे बुरी हार के बावजूद मोर्चे की अगुवा माकपा में नेतृत्व पर भले कोई सवाल न उठा हो लेकिन अगले कुछ महीनों में माकपा नेतृत्व को अन्य साथी वाम दलों के साथ ही पार्टी के अंदर के लोग भी सवाल-जवाब करेंगे। संसदीय चुनाव के तीन दशक के इतिहास में वामदलों की सबसे बुरी हार के बावजूद मोर्चे की अगुवा माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में नेतृत्व में भले कोई सवाल न उठा हो लेकिन अगले कुछ महीनों में माकपा नेतृत्व को अन्य साथी वाम दलों की आेर से ही नहीं पार्टी के भीतर भी कई असुविधाजनक सवालों से दो चार होना होगा। माकपा सूत्रों के अनुसार पोलित ब्यूरो की सोमवार को हुई बैठक में पार्टी महासचिव प्रकाश करात से इस्तीफे की भले कोई मांग नहीं उठी लेकिन सदस्यों ने डेढ़ दो दशक में देश की पहली धर्मनिरपेक्ष सरकार को भारत अमेरिका परमाणु करार जैसे गैर जमीनी सवाल पर असमय अस्थिर करने से लेकर कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जुटाकर तीसरे मोर्चे का कुनबा जोड़ने तक के मुद्दे पर पार्टी महासचिव से सवाल-जवाब किया। पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मतदाताआें को अगर केवल स्थिर सरकार की दरकार होगी तो कांग्रेस ही नहीं भाजपा भी फायदे में हो सकती थी। उक्त नेता ने कहा कि बात इतनी नहीं थी कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की पहली स्थिर और धर्मनिरपेक्ष सरकार भी थी।

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