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राजरंग

ढीली कीािये हुाूर इलेक्शन लड़ना अब हंसी-ठट्ठा का खेल नहीं है। बड़े-बड़ों के पसीने छूट जाते हैं। पांच साल तक एयरकंडीशन में रहने-घूमने-फिरने के लिए महीना-दो महीना तक धूल-धक्कड़ पीना और पसीना चुआना पड़ता है। हर आदमी के सामने हाथ जोड़ कर हंसना और मुस्कुराना पड़ता है। फिर भी नय पता कि सामनेवाला आदमी भोट देबे करगा। इधर महंगाई ने तो हर चीज को महंगी करके रख दिया है। चुनाव भी तो महंगा खेल हो गया है। हालांकि चुनाव करानेवाले बड़े हाकिम लोगों ने थोड़ी राहत दे दी है। एक नंबर में भले ही खर्च की सीमा बांध दी हो, लेकिन बैकडोर से तो इसकी कोई सीमा नहीं है। अब कोई कैंडिडेट अंटी टाइट रख कर चुनाव नहीं लड़ सकता है। इसलिए जनाब अब हर कैंडिडेट अपने को बदल रहा है। अंटी ढीली कर रहा है। अब सामनेवाला दमदार हो, तो यह प्रॉब्लम कहीं ज्यादा बड़ी हो जा रही है। फिर भी हुाूर, चुनाव लड़ना है तो अंटी ढीली कीािये..। आपके कार्यकर्ता, सपोर्टर आपकी राह तक रहे हैं। नेताजी आयेंगे, हमार लिए क्या लायेंगे..।

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