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संत चोखामेला

महाराष्ट्र में जिन संतों ने जाति-पांति और ऊंच-नीच का भेदभाव मिटा कर, भगवान की भक्ित की, उनमें संत चोखामेला का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उन्हें श्री विट्ठल की कृपा प्राप्त थी। ज्ञानेश्वर की संत मंडली में चोखामेला का बड़ा आदर था। चोखामेला महार थे और बस्ती से मरे हुए पशुओं को उठाने का काम करते थे। इनका निवास मंगल बेढ़ा नामक स्थान में था। चोखामेला के मन में बचपन से ही ईश्वर की भक्ित और संतों का पवित्र जीवन जीने की रट लगी थी। वह विट्ठल के दर्शनों के लिए प्राय: ही पंढरपुर जाते थे। उन दिनों पंढरपुर में संत नामदेव का बड़ा प्रभाव था। विट्ठल के मंदिर में संत नामदेव भजन गाया करते थे। नामदेव के अभंग सुनकर चोखामेला इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपना गुरु मानने लगे। चोखामेला का परिवार पहले से ही ईश्वर का भक्त था। नामदेव के सम्पर्क में आने के बाद से चोखामेला का पूरा परिवार ही विट्ठल का भक्त हो गया। चोखामेला की पत्नी सोयराबाई, बहन निर्मलाबाई, पुत्र कर्ममेला, साला बांका महार आदि सभी ने नामदेव से दीक्षा ले ली थी। सोयराबाई का एक अभंग है- ‘हे प्रभु, तेर दर्शन करके मेर हृदय की सब वासनाएं नष्ट हो गई हैं, भेदभाव मिट गया है। मेरा हृदय शुद्ध हो गया। अब न छुआछूत का भाव रहा, न अहंकार रहा। चोखामेला की भक्ित से प्रसन्न होकर एक बार श्री विट्ठल इन्हें मंदिर के भीतर ले गए और अपने दिव्य दर्शनों से उन्हें कृपार्थ किया। श्री विट्ठल ने चोखामेला के गले में अपना एक हार पहनाया और साथ में तुलसी की माला भी दी। उस समय पुजारी सो रहे थे। चोखामेला जसे ही वहां से चले कि पुजारी जाग गए। एक तो वे चोखामेला के मंदिर-प्रवेश से ही क्रुद्ध हो गए। फिर गले में हार और तुलसी माला देखकर उन्हें चोर समझा। उन्होंने कहा- इसने ठाकुर जी को छू कर भ्रष्ट कर दिया है। इसलिए पुजारियों ने चोखामेला को पीटा, हार और माला छीन ली और धक्के मारकर मंदिर से बाहर निकाल दिया। लेकिन चोखामेला ‘विट्ठल-विट्ठल’ का जाप करते रहे और उन्हें कोई कष्ट नहीं व्यापा।

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  • Web Title: संत चोखामेला