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आम चुनाव के खास सबक

चुनाव परिणाम आ चुके हैं, कांग्रेस एक निर्णायक और शक्ितशाली राजनीतिक इकाई के तौर पर उभरी है। लगभग सभी चुनावी भविष्यवाणियां और अनुमान गलत निकले हैं। कोई भी एगिट पोल सटीक कहने के आस-पास भी नहीं फटक पाया। भारतीय मतदाताओं ने फिर जता दिया है कि उनका मन जान पाना आसान नहीं है। उन्होंने ज्यादा निर्णायक और काम करने वाली सरकार चुनी है। उन्होंने महसूस किया कि ज्यादा खींचतान वाले गठबंधन के शासन में आने से देश को नुकसान होता है। इस तरह की सरकारं देश की छवि ही नहीं नीतिगत निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करती हैं, जिसके बिना हमार दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक नहीं साधे जा सकते। देखते हैं कि इस चुनाव के परिणामों के क्या मायने हैं? निश्चित तौर पर कांग्रेस पार्टी मजबूत हुई है, पर प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी कमजोर हुई है। इसके बावजूद कांग्रेस की जो ताकत बढ़ी है, वह भाजपा को नहीं क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंचा कर बढ़ी है। इससे पता चलता है कि जनता में क्षेत्रीय दलों के खिलाफ एक प्रकार का रुझान रहा है, जिससे कि मुख्यधारा की राष्ट्रीय पार्टियां मजबूत हुई हैं। लगता है कि दीर्घकाल में वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी जसे तीन राजनीतिक समूहों का होना ज्यादा स्वस्थ लोकतंत्र का लक्षण होगा। हालांकि यह स्वरूप रातों-रात नहीं उभरने वाला है। वैसे कई वर्षो के एकदलीय शासन के बाद हमने छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों का उभार देखा। आज यही प्रक्रिया पलट रही है। इससे ज्यादा परिपक्व लोकतांत्रिक ढांचा बनेगा। राष्ट्रीय दलों को यह समझने की जरूरत है कि क्षेत्रीय दलों का उभार इसलिए हुआ क्योंकि राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाए थे। आज अगर राष्ट्रीय दल शक्ितशाली हो रहे हैं तो उन्हें क्षेत्रीय आकांक्षाओं का ख्याल रखना पड़ेगा। इसलिए पहला सबक यह है कि यह परिणाम एकीकरण की तरफ ज्यादा और विखंडन की तरफ कम संकेत करते हैं। हालांकि विवादस्पद और आपराधिक पृष्ठभूमि के ज्यादा उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार के मतदाताओं ने उन्हें ज्यादा महत्व दिया है जिनका आपराधिक अतीत और विवाद से कोई नाता नहीं है। मतदाताओं ने यह तिरस्कार अपराधियों के करीबी रिश्तेदारों के प्रति भी दिखाया, तीसरी बात यह है कि जहां भी विकास केंद्रित सुशासन और उसमें लोगों को भागीदार बनाने का एजेंडा रहा है, उस पार्टी को जनता ने समर्थन दिया है। बिहार में नीतीश कुमार के बार में यह लगा कि वे धर्मनिरपेक्ष, विकास केंद्रित और उसमें भागीदारी की राजनीति कर रहे हैं तो लोगों ने उन्हें अपना समर्थन दिया। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मध्य प्रदेश ने भी एक हद तक कांग्रेस की लहर को रोक लिया और यही काम नवीन पटनायक भी कर गए। अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा तो उसका श्रेय मुलायम और मायावती सरकारों के खराब प्रदर्शन को जाता है। केरल और बंगाल में पीछे ले जाने वाले कार्यक्रमों और पार्टी के भीतर की खींचतान के चलते वामपंथी दलों को करारा झटका लगा। चुनाव का चौथा सबक यह है कि मतदाताओं ने उन पार्टियों का चयन किया, जिनका मुख्य जोर न तो जाति पर था न ही धर्म पर। वे उन पार्टियों को चुनना चाहते थे जिनकी नीतियां आर्थिक और सामाजिक प्रगति का प्रतिनिधित्व करती हैं। अमेरिका के साथ किए गए एटमी करार से अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों पर फर्क नहीं पड़ा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टीनीत सरकार ने दूरसंचार, सड़क, बिजली जसे आगे ले जाने वाले उन आर्थिक सामाजिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया, जिन्हें मध्यवर्ग अपनी समृद्धि से जोड़ता है। यहां तक कि अमेरिका के साथ रणनीतिक गठाोड़ उस सहयोगी के साथ संबंध बनाने का प्रयास है, जो समृद्ध है और उसकी समृद्धि उनके जीवन में भी आ सकती है। शहरी क्षेत्रों में भाजपा के खराब प्रदर्शन के और कोई कारण नहीं हैं। क्योंकि जहां कांग्रेस समाजवादी नीतियों की हिमायत के लिए जानी जाती थी, वहीं भारतीय जनता पार्टी व्यापारियों और कारोबारियों की पार्टी के रूप में बाजार की नीतियों की ज्यादा समर्थक मानी जाती रही है। आखिर भाजपा का यह शहरी जनाधार क्यों खिसक गया? इसका स्पष्ट कारण यह है कि शहरी मध्यवर्ग उस पार्टी को चुनना पसंद करगा जो सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाए बिना ज्यादा आर्थिक समृद्धि लाने का काम करगी। भाजपा के भीतर चल रहा पहचान का यह संकट उसके नेतृत्व के भ्रम में भी दिखाई पड़ा। पार्टी पहले आडवाणी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया, फिर नरंद्र मोदी का भी नाम उछाल कर यह दिखा दिया कि पार्टी विभाजित है। इससे पहले राजनाथ सिंह और अरुण जेटली के बीच खींचतान सतह पर आ ही गई थी और अगर हम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्राथमिकताओं की बात न भी करं तो भी यह स्पष्ट है कि आडवाणी और राजनाथ सिंह के बीच समीकरण ठीक बैठ नहीं रहे थे। संक्षेप में शहरी समाज विशेष तौर पर मध्यवर्ग इस तरह की विभाजित अस्मिताओं को पसंद नहीं करता। वह चाहता है कि सकारात्मक परिवर्तनों के साथ उसके जीवनस्तर में खासा सुधार हो और उसकी संतानों को रोगार के अच्छे अवसर और आर्थिक तरक्की का वातावरण मिले। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि भाजपा वरुण गांधी के अल्पसंख्यक विरोधी बयानों पर निर्णायक तरीके से एक सुर में नहीं बोल पायी, इसलिए मुस्लिमों के वोट एकाुट हो गए। इस चुनाव का हमार लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या है? पहला संदेश तो यह है कि मतदाताओं के भीतर एक नए तरह की जागरूकता और परिपक्वता आई है। दूसरी बात यह है कि वह जाति और धर्म केंद्रित राजनीति से आगे गया है। तीसरा संदेश यह है कि वह उन विश्वसनीय प्रयासों को पुरस्कृत करता है जो सामाजिक शांति और भागीदारी के साथ आर्थिक तरक्की के लिए किए जाते हैं। आखिरी बात यह है कि वह शासन की स्थिरता और नीतियों की निरंतरता का चयन करता है। चुनाव महंगे होते हैं और उसमें काफी समय लगता है। इसलिए जो पार्टी दीर्घकालिक स्थिरता दे सकती है, उसे ही सत्ता में लाया जाना चाहिए। क्या छोटी पार्टियां सिकुड़ कर मुख्यधारा में विलीन हो जाएंगी? बिखरी राजनीतिक इकाइयों के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई है। क्षेत्रीयता तभी बचेगी, जब वह राष्ट्रीय दलों के मुकाबले स्थिरता और तरक्की का बेहतर आश्वासन देती है। यह क्षेत्रीय दलों के लिए नई चुनौती है। शायद नीतीश कुमार के पास इसके कई जवाब हैं। बाकी क्षेत्रीय पार्टियां, जिन्हें अभी भी भारतीय राजनीति में अपनी जगह बरकरार रखनी है, उन्हें कुछ सबक लेने होंगे। ठ्ठड्डठ्ठस्र्ह्वञ्च ठ्ठद्मह्यन्ठ्ठद्दद्ध.ष्oद्व लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं।ं

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