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दो टूक

सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग नियम-व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए फैसला लेने लगते हैं, तो कई बार अनर्थ हो जाता है। फैसला लेनेवालों की किरकिरी होती है, वो अलग। सत्ता के संचालन का जिम्मा जब अनुभवी और जानकार लोगों पर रहता है, तो उनसे इतनी तो अपेक्षा होती ही है कि वे सोच-समझ कर ही कोई फैसला लेंगे। सूबे के राज्यकर्मियों के डीए और कांट्रैक्टकर्मियों की वेतनवृद्धि मामले में क्या हुआ? देश में अभी आचार संहिता लागू है। सरकार कोई लोक लुभावन फैसला नहीं ले सकती है। निहायत जरूरी हो तो चुनाव आयोग की अनुमति लेनी होती है। लेकिन राज्यपाल की सलाहकार परिषद ने आयोग की अनुमति के बगैर डीए और वेतनवृद्धि का फैसला ले लिया। यह तो वही बात हुई- बिना विचार जो कर सो पाछे पछताय।

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