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भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट ने कसा शिकंजा

उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि सरकारी कर्मचारियों के गैरकानूनी कायर्ों का कार्यालय संबंधी उनके कामकाज से कोई लेना देना नहीं है इसलिए भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है। न्यायमूर्ति जीपी माथुर और न्यायमूर्ति अफताब आलम की पीठ ने नागपुर में सरकारी अस्पतालांे और कॉलेजों में एचआईवी दूषित रक्त आपूर्ति करने के मामले में संलिप्त दो डॉक्टरों समेत सात लोगों के खिलाफ निचली अदालत को सुनवाई करने का निर्देश दिया है। इस रक्त को चढ़ाए जाने के बाद कई मरीज एचआईवी पॉजिटिव पाए गए। जांच के दौरान पुलिस ने ब्लड बैंक के रिकॉर्ड में छेड़छाड़ पाने पर डॉ. पीपी संचेति, देवहरी देव सिंह पवार, डॉ. प्रकाश चंद्र और प्रध्या सुधाकर फडनवीस समेत सात लोगों को आरोपी बनाया। मामले की सुनवाई कर रही नागपुर की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि इस संबंध में धारा 1े तहत सरकार से अनुमति नहीं ली गई लेकिन सत्र न्यायालय ने इस आदेश को पलट दिया था जिसे बंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। बाद में उच्च न्यायालय ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई खारिज कर दी। महाराष्ट्र सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। ऑफिस के रिकॉर्ड में छेड़छाड़ के बावजूद इन आरोपियों पर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगाया था। डॉ. संचेति के घर से छापे के दौरान ब्लड बैंक के रजिस्टर से फाड़े गए पन्ने बरामद हुए थे। आरोपियों पर ड्रग्स एंड कोस्मेटिक्स एक्ट 10 के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे। उच्चतम न्यायालय ने 18 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि हमें यह समझ नहीं आ रहा है कि ऑफिस के रिकॉर्ड में की गई छेड़छाड़ का कार्यालय की डय़ूटी से कोई लेना देना है। हमें आरोपियों की कारगुजारियों को लेकर उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में तनिक भी संदेह नहीं है इसलिए अपराध दंड संहिता 1े तहत अभियोजन को किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है।

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  • Web Title: भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट ने कसा शिकंजा