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कैश की माया, बढ़ी पसंद बड़े नोटों की

चेक की तुलना में कैश में डील करने वालों ने पांच सौ रुपये और एक हजार रुपये के करारे नोटों की मांग में तगड़ा इजाफा कर दिया है। इसके चलते 10, 20, 50 और यहां तक की सौ के नोटों की मांग को बाजार भी बुरी तरह से घट गई है। रिजर्व बैंक को इस बात का अहसास है। उसकी एक ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी भी दी गई है। पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों की मांग को बढ़ाने में प्रॉपर्टी और थोक के कारोबारियों की अहम भूमिका रही है। इनकी दुनिया में प्राय: चेक के लिए कोई जगह नहीं होती। सारा लेन-देन आमतौर पर कैश में ही होता है। हालांकि जानकार कहते हैं कि बड़े नोटों को छापने में आरबीआई को अधिक खर्च करना पड़ता है। उसकी लागत बढ़ जाती है। लेकिन उसकी दिक्कत यह है कि उसे जो बैंक फीडबैक देते है, उसके आधार पर ही उसे नोट छापने होते हैं। अगर बैंक 500 और 1000 रुपये के नोटों की मांग करेंगे तो आरबीआई को उन नोटों को बैंकों को देना ही होगा। मालूम चला है कि साल 2006-07 के दौरान 500 रुपये के नोटों की मांग में करीब 24 प्रतिशत का इजाफा हुआ। अगर बात एक हजार रुपये के नोटों की कर ली जाए तो उनमें इस दौरान करीब 45 प्रतिशत की मांग बढ़ी। जाहिर है कि इतनी तगड़ी मांग को देश की बेहतरीन अर्थव्यवस्था से जोड़कर भी देखने की जरूरत है। देश की अर्थव्यवस्था करीबीसदी की रफ्तार से कदम बढ़ा रही है। बैंकिंग की दुनिया के एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि एटीएम ने भी बढ़ा दी है 500 और एक हजार रुपये के नोटों की मांग और उपयोगिता। आरबीआई की रिपोर्ट मे कहा गया है कि 20, 50 और 100 रुपये के नोट की मांग में कतई इजाफा नहीं हो रहा है। मांग करीब-करीब स्थिर है। इससे साफ है कि 500 और 1000 रुपये के नोटों को लेने वाले बढ़ते जा रहे हैं। इन नोटों के हक में एक बात यह भी कही जा रही है कि अगर किसी को बैंक से एक लाख रुपये निकलवाने पड़े तो उसका एक गड्डी में ही काम हो जाएगा। अगर उसे दस या बीस रुपये के नोट दिए जाएं तो लेने वाले को भी खासी असुविधा होगी। बैंकरों की तरफ से दस रुपये के नोटों की मांग लगातार घटने के चलते बैंकों ने भी इन्हें छापना कम कर दिया है।

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