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दंतेवाड़ा में नक्सलियों की है बाकायदा सरकार

तमिलनाडु के सत्यमंगलम जंगल में वीरप्पन का राज चलता था तो दंतेवाड़ा के जंगलों में नक्सलियों की अपनी सरकार है। कैंपों में 8-10 हजार नक्सली डय़ूटी बजाते हैं। आधुनिक हथियारों से लैस इन नक्सलियों के पास हाई फ्रीक्वेंसी वाले विदेशी वायरलेस सेट, कीमती गाड़ियां और बाइक भी उपलब्ध हैं। बहुसंख्यक (0 फीसदी) नक्सली तेलुगू हैं। नक्सली सूत्र के मुताबिक, ‘हमारे पास 12-30 साल उम्र के हजारों युवक-युवतियां हैं।’ उनकी फौज में एमबीए, डाक्टर, इंजीनियर, आईटी प्रोफेशनल, नर्स, लेखक, प्रोफेसर, कलाकार और एकाउंटेंट भी शामिल हैं। टीवी पर संसद की कार्रवाई और खबरों पर पूरी नजर रखते हैं। बाल काडरों को पढ़ाई जा रही किताबों में माओ, शहीद भगत सिंह का नाम तो है लेकिन गांधी उन्हें स्वीकार नहीं है। कमांडर (सूत्र) ने साफ किया, ‘हमारे निशाने पर आम लोग नहीं बल्कि सत्ता पदों पर काबिज भ्रष्ट नेता, अधिकारी, खासकर वन अधिकारी और इंजीनियर हैं। हमारी लड़ाई अन्याय और पुलिसिया जुल्म के खिलाफ है।’ बीड़ी पत्ता और वन ठेकेदारों के जरिये राजनेता नक्सलियों को नियमित नजराने के तौर पर पैसे देने को मजबूर हैं। और तो और एमपी, एमएलए और सरपंच अपने स्थानीय विकास के पैसे का एक बड़ा हिस्सा उन्हें पहुंचते हैं। एक समझौते के तहत चुनाव में वे एक-दूसरे की मदद करते हैं। सूत्रों के मुताबिक नक्सली बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में आंदोलन तेज करने की योजना बना रहे हैं। देश के पंद्रह राज्यों के तीन सौ से भी अधिक पुलिस थाना क्षेत्रों में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की है और अब पूरब की तरफ बढ़ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्हें श्रीलंका में सक्रिय लिट्टे के कमांडरों से ट्रेनिंग, संचार के साधन व पैसे तक की मदद मिली। अंग्रेजी मीडिया से नक्सली सख्त नाराज हैं। उनका दावा है स्थानीय पुलिस हमारी सबसे बड़ी मददगार है। उन्हें हमारी ताकत का अहसास है। छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि दंतेवाड़ा के 70 फीसदी इलाक ों पर पुलिस और प्रशासन का नियंत्रण नहीं है। उन्होंने कहा कि पुलिस को जिन दो कारणों से हथियार नहीं दिए जाते, उनमें पहला है जवानों को उपलब्ध कराये गए हथियार नक्सली लूट ले जाते हैं फिर उनके हथियार रखने का इसलिए भी कोई मतलब नहीं है क्योकि वे नक्सलियों से लोहा लेने के लिए ट्रेंड नहीं है।

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