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किसानों को झुनझुना

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, संप्रग सरकार को किसानों की चिंता सताने लगी है। खेती घाटे का सौदा बन चुकी है, यह तथ्य बरसों पहले स्वीकार किया जाता है। सरकारी सर्वेक्षण उजागर करते हैं कि बड़ी संख्या में किसान खेती छोड़कर अन्य धंधा करना चाहते हैं, किन्तु कुछ तो धरती का मोह और कुछ मजबूरी के चलते जमीन जोतने का पुश्तैनी काम कर रहे हैं। सूखे, बाढ़ या बाजार भाव की गहरी चोट खाकर पिछले एक दशक में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार किसानों पर करीब एक लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। मनमोहन सिंह सरकार इस बोझ को कम करने के लिए कदम उठाने का मन बना रही है। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। प्रस्तावित योजना के तहत चार वर्ष के भीतर किसानों का 60 से 70 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ किया जाएगा। योजना में छोटे और सीमांत किसानों का शत-प्रतिशत ऋण माफ करने का प्रस्ताव है। सरकार की नीयत ठीक है, पर तथ्य कुछ और इशारा करते हैं। छोटे और सीमांत किसानों की बड़ी संख्या आज संस्थागत ऋणों के दायरे से बाहर हो चुकी है। वे महाजनों के कर्ज तले दबे हैं, जिससे इस पहल का उन्हें शायद ही लाभ मिले। ऋण जोखिम कोष बनाकर पहले उन्हें संस्थागत व्यवस्था से जोड़ा जाना जरूरी है। राष्ट्रीय कृषक आयोग की सिफारिश के अनुसार किसानों को कर्ज पर ब्याज दर घटानी भी जरूरी है। जिस देश की 70 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी हो, वहां कार सस्ते व ट्रैक्टर महंगे ब्याज पर मिले, देखकर विचित्र लगता है। किसानों का कर्ज माफ करने मात्र से कृषि पर व्याप्त वर्तमान संकट को टालना कठिन है। उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के मौजूदा दौर में किसान व खेती पर संकट के मूल कारण जानना और उन पर प्रहार करना जरूरी है। कर्ज माफ करने से पहले यह बताया जाना चाहिए कि किसान पर इतना कर्ज चढ़ा क्यों है? सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान अब भले ही बीस प्रतिशत से कम रह गया हो, किन्तु खेती का कल्याण किए बिना सेवा और उद्योग क्षेत्र के विकास की तेज रफ्तार को बनाए रखना असंभव है। किसानों की सच्ची मदद सिंचाई, खाद व बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाकर ही की जा सकती है। यदि उन्हें अपनी पैदावार का समुचित समर्थन मूल्य मिले तथा फसल बीमा प्रणाली बेहतर हो, तो कर्जे के कुचक्र को आसानी से काटा जा सकता है। दूसरी हरित क्रांति को अमली जामा पहनाने में अब और देर नहीं होनी चाहिए। गेहूं, चावल और दालों की ऊंची कीमत तथा प्रति व्यक्ित घटती खाद्यान्न खपत दर से खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। खाद्य सुरक्षा की उपेक्षा किसी भी कीमत पर नहीं की जा सकती। कर्ज माफी का फैसला, कृषि संकट का फौरी हल हो सकता है। स्थायी हल के लिए बड़े सोच व बड़े फैसलों की दरकार है।

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