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शिक्षा मंत्रियों के राज्यों में ही मुस्लिम शिक्षा बेहाल

देश में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार भले ही अनेक रियायतें दे रही हो, लेकिन केंद्र में सत्तासीन तीन शिक्षा मंत्रियों के गृह राज्यों में मुस्लिम शिक्षा की स्थिति चिंताजनक है। मुस्लिम छात्रों के गिरते दाखिला दर, स्कूलों की स्थिति, नागरिक सुविधाओं के अभाव और शिक्षकों की उपलब्धता आदि को लेकर नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (न्यूपा) के ताजा आंकड़े सरकारी दावे के पोल खोलते हैं। बिहार में प्राथमिक स्कूलों के दाखिला दर में बीते छह सालों में भारी गिरावट आई है। राज्य में 28 फीसदी से अधिक मुस्लिम छात्र स्कूलों से बाहर हैं। बीते दो सालों में स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में भले ही एक फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन उन्हें तालीम देने वाले पचास फीसदी से अधिक शिक्षक गैर प्रशिक्षित हैं। बिहार में पचीस फीसदी शिक्षक साल में औसत एक महीने गैर शिक्षण काम में व्यस्त रहते हैं। राज्य में 48 फीसदी स्कूलों की दशा खराब है और 84 फीसदी स्कूलों में कन्या छात्रों के लिए अलग से शौचालय तक नहीं है। राज्य में सत्रह फीसदी ऐसे स्कूल हैं, जहां सौ छात्रों पर एक शिक्षक तैनात है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री एम .ए.ए. फातमी संसद में बिहार का प्रतिनिधित्व करते हैं। आंध्र प्रदेश की स्थिति भी बहुत उत्साहजनक नहीं है। बीते साल में राज्य के मुस्लिम छात्रों के दाखिला दर में एक फीसदी तक की भी वृद्धि नहीं हो सकी। प्राथमिक स्कूलों में तैनात शिक्षकों में 60 फीसदी से अधिक गैर प्रशिक्षित हैं। बिहार की तरह राज्य में लगभग 60 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उच्च शिक्षा राज्य मंत्री डी. पुरंदेश्वरी संसद में आंध्र प्रदेश का प्रतिनिधिनित्व करती हैं। मध्य प्रदेश में चौदह फीसदी स्कूल एक शिक्षक के हवाले हैं और सत्तर फीसदी से अधिक स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं हैं। बीते साल में राज्य में मुस्लिम छात्रों के दाखिले में कोई वृद्धि नहीं हुई। उक्त राज्यों की तरह मध्य प्रदेश में भी लगभग छह फीसदी शिक्षक गैर शिक्षण कार्य में लगाए गए। राज्य में पचास फीसदी स्कूलों को दीवार तक मयस्सर नहीं है। मध्य प्रदेश मानव संसाधन विकास मंत्री अजरुन सिंह का गृह राज्य है। झारखंड में जहां पचास फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं, वहीं राज्य में अल्पसंख्यक दाखिला दर में गिरावट आई है। उत्तर प्रदेश में 13 फीसदी स्कूलों में सौ छात्रों का भविष्य एक शिक्षक के हवाले है और 22 फीसदी से अधिक स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं।

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