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नेताओं के अलावा भी हैं ‘भारत रत्न’

अपने देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न के लिए कई नामों को उछाला जा रहा है। मसलन, अटल बिहारी वाजपेयी, ज्योति बसु, कांशी राम, चौधरी चरण सिंह, करुणानिधि वगैरह-वगैरह। ये सब बड़ी हस्तियां हैं। सभी राजनीतिक शख्सीयत हैं। कोई शक नहीं कि अभी और नाम उछाले जाएंगे। उन पर कौन फैसला करेगा? किस बिना पर नाम तय होगा? उसका कोई अंदाजा मुझे नहीं है। सम्मान, अलंकरण या पदवियों को ले कर दुनियाभर में लोग परेशान रहते हैं। अपने देश में भी होते हैं। अगर कोई महाराजा या नवाब नहीं है, तो वह टिक्कू, कंवर या नवाबजादा तो हो ही सकता है। ब्रिटेन में तो सम्मानों की एक पूरी परंपरा है। लेकिन उन्होंने हिन्दुस्तानियों के लिए अलग से कुछ ईजाद किया। यानी रायसाहब, रायबहादुर, सर और लॉर्ड तक। मुसलमानों और सिखों के लिए भी अलग से व्यवस्था की गई। वहां तब तक किसी को कोई सुराग नहीं होता था, जब तक वायसराय या गवर्नर उन्हें नवाज नहीं देता था। एक निहंग को पकड़ लिया गया। उसने सरदार बहादुर अपने नाम के आगे जोड़ लिया था। उसका नाम था शेरजंग सिंह। उसका जवाब लाजवाब था, ‘मेरे गुरु ने मुझे सरदार बनाया। मैं बहादुर तो हूं ही। मैंने कौन सा जुर्म कर दिया?’ अब हर शख्स समझता है कि उसमें जो भी खास है, उसे दूसरे मानें। उसे ले कर ही सरकार से सम्मान की होड़ लगती है। अभी तक अपनी सरकार इस तरह के सम्मान के लिए खासा चुनिंदा रही है। मसलन, प्रधानमंत्री, राजनेता, विज्ञानी, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार वगैरह। उन्हें चुनने के लिए सरकार के मन में क्या रहता है? यह साफ नहीं है। मेरा मानना है कि इन सम्मानों के लिए महज राजनेताआें को ही नहीं चुना जाना चाहिए। असल में जिन लोगों ने सच में जनता की सेवा की है, उन्हें मिलने चाहिए। मुझे कुछ बेहतर लोग याद आते हैं। जैसे ‘कॉमन कॉज’ के एचडी शौरी थे। उनकी चर्चा तो खूब होती थी, लेकिन उन्हें सम्मान नहीं दिया गया। एक कुरियन साहब हैं। वही दूध वाले, जिन्होंने इस देश में सफेद क्रांति की। इला भट्ट हैं, जिन्होंने बेरोजगार महिलाआें को कुछ करना सिखाया। एक बिंदेश्वर पाठक हैं, जिन्होंने सुलभ के जरिए आम आदमी के लिए टॉयलेट बनाए। इस तरह देशभर में कुछ लोग और भी होंगे। उन्हें अपनी सरकार से सम्मान मिलना ही चाहिए। शान ए शहर से जाम ए शहर तक हर जनवरी के आखिरी सप्ताह में मैं राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड देखता हूं। विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट का लुत्फ उठाता हूं। उस वक्त मैं अक्सर एड्विन लुटय़ंस की याद करता हूं। वही इस नई दिल्ली के आ*++++++++++++++++++++++++++++र्*टेक्ट थे। इस नए शहर को बसाने के लिए बहुत लोगों की जरूरत थी। सबसे पहले तो सरकार को जमीन मुहैया करानी थी। फिर आ*++++++++++++++++++++++++++++र्*टेक्ट चुनना था। उस आ*++++++++++++++++++++++++++++र्*टेक्ट के नक्शे के हिसाब से ठेकेदार को काम करना था। मिस्त्री, मजदूर और इंजीनियर जुटाने थे। ताकि सब कुछ प्लान के मुताबिक हो सके। ये सब नई दिल्ली बनाने के लिए था। बाद में यह दुनिया की बेहतरीन राजधानी बनी। उसमें लंबी चौड़ी सड़कें व खूब हरियाली थी। रहने के लिए कमाल की जगह थी। मैंने अपनी साल की जिन्दगी का ज्यादातर वक्त यहीं गुजारा है। मैं खुद को नई दिल्ली वाला कहता भी हूं, लेकिन अब यह शहर पहचाना नहीं जाता। अजीब तरीके से यह उत्तर प्रदेश के नोएडा व गाजियाबाद से हरियाणा में गुड़गांव और फरीदाबाद तक फैल गया है। लुटय़ंस ने इसे चंद नौकरशाहों और उनके स्टाफ के लिए बसाया था। अब उसकी आबादी बुरी तरह बढ़ गई है। सड़कें सुबह से रात तक जाम रहती हैं। इस शहर में मुंबई से दोगुनी तादाद में औरतों से छेड़छाड़ और बलात्कार के मामले होते हैं। मेरी जवानी के दिनों में दिल्ली में रहना शान की बात थी। अब मैं मजबूरी में रहता हूं। कहीं और जा नहीं सकता। शान ए शहर से जाम ए शहर तक है नई दिल्ली की कहानी। उसे बेहद खूबसूरती से रंजना सेनगुप्ता ने अपनी किताब ‘डेल्ही मेट्रोपॉलिटन: द मेकिंग ऑफ एन अनलाइकली सिटी’ में लिखा है। उस शहर को बनाने वालों की बात करने के साथ वह उसे बिगाड़ने वालों की तरफ भी इशारा करती हैं। वह आ*++++++++++++++++++++++++++++र्*टेक्ट हफीज कॉन्ट्रेक्टर और बिल्डर चौधरी राघवेंद्र सिंह और उनके दामाद केपी सिंह के बनाए मॉॅडर्न गुड़गांव का भी जिक्र करती हैं। उसे पढ़कर मजा आता है।

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