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क्रिकेट का कारोबार

यह तो शायद होना ही था। भूमंडलीकृत क्रिकेट का अब पूरी तरह बाजारीकरण हो गया है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने 20-20 आेवर के नाम पर फटाफट सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के सौदे किए हैं। आगामी अप्रैल माह से शुरु हो रही इंडियन प्रीमियर लीग की टीमों की नीलामी में उद्योगपतियों और फिल्मी हस्तियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और दस बरस के लिए अपनी पसंद व अपनी हैसियत के मुताबिक टीम खरीद लीं। टीमें बिक चुकी हैं और अब अगले महीने खिलाड़ियों का बाजार सजेगा, जिसमें देश और दुनिया के नामी क्रिकेटरों की खुलेआम बिक्री होगी। क्रिकेट विशुद्ध मनोरंजन और मोटी कमाई का माध्यम बनता जा रहा है। अलबत्ता इसमें खेल का अंश निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। जिन लोगों का कभी क्रिकेट से कोई नाता नहीं रहा, वे इसके भाग्यविधाता बन गए हैं। बड़ी-बड़ी फिल्मी हस्तियां और औद्योगिक घराने संभवत: मुनाफे को भांपकर ही देश के सर्वाधिक लोकप्रिय खेल से जुड़ रहे हैं। यूरोप और अमेरिका में फुटबाल और बास्केटबाल जैसे जनप्रिय खेलों का जो स्वरूप है, कुछ वैसी ही शक्ल भारतीय क्रिकेट की दिखने लगी है। वह दिन दूर नहीं, जब इंडियन प्रीमियर लीग की टीमें शेयर बाजार में उतारी जाएंगी। किसी टीम के खिलाड़ियों और हार-जीत के रिकार्ड के अनुसार उसका शेयर भाव ऊपर-नीचे सरकेगा। क्रिकेट जिस राह पर चल निकली है, उससे हाकी, फुटबाल जैसे अन्य खेलों की राह कठिन हो गई है। देश में क्रिकेट और अन्य खेलों में अब राजा भोज और गंगू तेली जैसा अन्तर आ जाएगा। क्रिकेट पर लक्ष्मी बरसे और बाकी खेल मूलभूत सुविधाआें को तरसें, यह चिंता का विषय है। बाजार की ताकतें क्रिकेट को नशा बनाने पर आमादा हैं। क्रिकेट अब पैसे में इतना रच-बस गया है कि दर्शकों को शेष खेल फीके लगने लगे हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अब एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी जैसा बन गया है। उसके पास यदि इतना धन और साधन आ गए हैं, तो उसे किसी भी तरह की सरकारी मदद या छूट नहीं दी जानी चाहिए। क्रिकेट मैचों के आयोजन के दौरान सुरक्षा या अन्य सुविधा प्रदान करने की एवज में भी सरकार को बीसीसीआई से जमकर पैसा लेना चाहिए। उस धन को अन्य खेलों के कल्याण पर खर्च किया जा सकता है।

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