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खौफ- ए- ‘बर्ड फ्लू’

‘बर्ड फ्लू’ बीमारी भले ही मुर्गे- मुर्गियों की हो लेकिन उसका सीधा असर खाते- पीते घर के लोगों पर भी पड़ता है। उस दिन जब अखबार में खबर पढ़ी कि बंगाल में बीस लाख मुर्गे- मुर्गियों को मारा जाएगा तो कलेजा मुंह को आ गया। बीस लाख मुर्गे मतलब अस्सी लाख लेग पीस (प्रति मुर्गा चार की दर से। जानकारी के लिए बता दूं कि भौतिक रूप से मुर्गे की दो ही टांखौफ- ए- ‘बर्ड फ्लू’ गें दिखती हैं, शेष दो हाथी के खाने के दांतों की तरह छिपी रहती हैं। तब दिखती हैं, जब दुकानदार मुर्गे का एक- एक नट- बोल्ट खोलकर पालीथिन में पैक करके देता है।)। जरा सोचिए कितनी बारातें, पार्टियां, बैठकें और समारोह निपट जाते इन अस्सी लाख टांगों से। भगवान उन टांगों समेत समस्त मुर्गा समुदाय की आत्मा को शांति दे, जो बर्ड फ्लू के नाम पर शहीद हो गये या शहादत की लाइन में हैं।ड्ढr देखा जाए तो ये मुर्गा भी बड़े मजे का आइटम है। ये बनने, बनाने से लेकर खाने तक के काम आता है। इसे खाया जाए या दूसरे को पैर के नीचे से हाथ निकालकर कान पकड़े हुए देखा जाए, दोनों से पर्याप्त विटामिन मिलता है। मेरे एक मित्र का मानना है कि जिस प्रकार पालक का आविष्कार पकौड़े और बकरे का बिरयानी के लिए हुआ है, ठीक वैसे ही मुर्गे का तंदूर और कुकर के लिए हुआ है।ड्ढr ड्ढr आपने ध्यान से किसी मुर्गे को देखा है। मैं देसी की बात कर रहा हूं जनाब.. किसी फार्म वाले की नहीं। जिसके न मां- बाप का पता होता है और न खानदान का। देसी मुर्गे का चेहरा जरा गौर से देखिए। अहा. . ऊपर वाले ने सिर पर शानदार कलगी दी है, कोई आम आदमी की तरह कर्ज की गठरी नहीं। यानि, शाही मिजाज कुदरत की तरफ से पाया है। मर्जी हो तो बांग देगा, नहीं तो मौन व्रत धारण कर लेगा। क्या बिगाड़ लेगा कोई। ज्यादा से ज्यादा गर्दन पर छुरा फेर देगा। वो वैसे भी फिरना ही है।ड्ढr ड्ढr मेरे पड़ोसी की किचेन से हर संडे कुकर की सीटी बड़े जोर से दहाड़ती है। उस दहाड़ के साथ एक विशिष्ट खुशबू फिजां में तैर जाती है, जो कुकर में किसी चिकेन या मटन के अस्तित्व की चुगली करती है। उनके यहां से आजकल मूंग की दाल की महक आ रही है। हद है, बीमारी की इतनी दहशत शायद मुगरे में भी नहीं है, जितनी उन्हें खाने वालों में है। ‘मुर्गा मिशन’ में जुटे सरकारी कर्मचारी तक दहशत में हैं। बिना अंतरिक्ष सूट जैसा कुछ पहने वे मुर्गे के पास जाने की भी कल्पना नहीं कर सकते। अखबार में मैंने सफेद सूट में ढके एक कर्मचारी की फोटो देखी। ऐसा लगा जैसे वह मुर्गा नहीं, बम निष्क्रिय कर रहा हो।ड्ढr ड्ढr राजधानी के बोरिंग रोड मुर्गा मार्केट में मैंने एक चिकेन को दोपहर के समय बांग देते देखा। ताज्जुब भी हुआ और गुस्सा भी आया। कम्बख्त की हिमाकत तो देखिए। नियम- कायदे- संस्कार सब जैसे दाने के साथ चुग गया था। नालायक सुबह चार बजे की जगह दोपहर में बांग दे रहा था। खैर, क्रोध का घूंट पीकर उससे पूछा - ‘तुमने कोई दवा या इंजेक्शन लिया?’ड्ढr ‘क्यों?’ वह कुंकड़ाया।ड्ढr ड्ढr ‘अरे भय्या, बर्ड फ्लू के डर से बड़े- बड़े पेटू डायटिंग करने को मजबूर हैं और तुम यहां आराम से घूरे के ढेर में चाउमीन ढूंढ- ढूंढकर खा रहे हो।’ वह बोला - ‘मैं चिंता करके क्या करूंगा। मेरी चिंता तो इस समय पूरा देश कर रहा है। मुझे तो हर हाल में मरना है। अगर बर्ड फ्लू से बच गया तो सरकार दवा छिड़ककर मार देगी। इस डर से कि कहीं मेरी वजह से दूसरे न मर जाएं। फिर भी बच गया तो कितने दिन। किसी दिन कोई आएगा और पचास रुपये किलो की दर से मुझे तुलवाएगा। फिर किसी किचेन के कुकर में मेरे पंचतत्व सीटी बजाते नजर आएंगे।’ उसने एक क्षण रुककर छोटा सा ब्रेक लिया और फिर चालू हो गया - ‘आपकी जानकारी के लिए नामी- गिरामी लोग फिल्मों और टीवी में मेरी टांगें चबाते नजर आते हैं। काकटेल पार्टियों की शोभा मुझसे बढ़ती है। आजकल बीमारी का दौर चल रहा है। जरा सब्र कीजिए। जिस दिन अखबारों में बर्ड फ्लू का खतरा समाप्त होने की खबर छपेगी, उसी दिन लोग इस खुशी में मुझ पर टूट पड़ेंगे कि अब उन्हें कोई खतरा नहीं। इसलिए मेरी चिंता में कृपया आप दुबले न हों.. मुझे लंच करने दें और आप भी मेरा भेजा छोड़कर कुछ खा लें। जय बिहार! जय बर्ड फ्लू!’ं

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