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आरबीआई की ब्याज दरों में कमी लाने की चुनौती

अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में फिर 0.75 प्रतिशत की बड़ी कटौती के बाद भारतीय रिजर्व बैंक की ऋण और मौद्रिक नीति का मंगलवार को होने वाली तिमाही समीक्षा में भी ब्याज दरों में कमी किए जाने की उम्मीद की जा रही है लेकिन विश्व बाजार में खाद्यान्नों और तेल के ऊंचे दाम के कारण मंहगाई के दबाव को देखते हुए केन्द्रीय बैंक के लिए यह चुनौती भरा कदम लगता है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने इसी माह के शुरु में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रमुखों के साथ एक समीक्षा बैठक में उनसे ब्याज दरों में आधा प्रतिशत कमी लाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उस समय कुछ बैंकरों ने उम्मीद जताई थी कि रिजर्व बैंक की तिमाही समीक्षा के बाद ब्याज दरों में नरमी आ सकती है। हालांकि कुछ बैंकरों ने इससे पहले भी ब्याज दरों में कमी की उम्मीद व्यक्त की थी। बहरहाल ऊंची ब्याज दरों के वर्तमान परिदृश्य में भी इस साल आर्थिक वृद्धि दर 8.प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई गई है। अब जबकि अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था में मंदी की आशंका को देखते हुए ब्याज दरों में एक ही झटके में 0.75 प्रतिशत की कमी कर इन्हें 3.50 प्रतिशत पर ला दिया है तो भारतीय बाजार में उम्मीद बंधी है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में नरमी का रुख अपना सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कमी लाने के साथ ही जिस प्रकार विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम फिर बढकर 0 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गए हैं और रुपए की विनिमय दर में फिर से मजबूती का रुझान बन गया।

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