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मौकापरस्त जोड़-तोड़ या नया मोड़

लालू जी ने अन्तत: मुलायम सिंह से हाथ मिला लिया और तैयारी पूरी है, यादव जुगलबंदी से यूपी-बिहार के वोट लूटने की। जो थोड़ी-बहुत कसर बची थी मतदाता को लुभाने-रिझान के लिए ठुमका लगाने वाले नाच में, वह पूरी कर दी रामविलास पासवान के बतौर संगत वाले तबलची के रूप में आ बैठने ने। कहने को यह मोर्चा धर्मनिरपेक्ष राज्य को निरापद रखन के लिए लोहिया जी के पुराने शिष्यों और कल नहीं तो परसों के समाजवादियों को एकजुट करन के लिए बनाया गया है पर असलियत कुछ और नज़र आ रहीं है। अमर सिंह ने अपनी स्वाभाविक मुंहफट शैली में यह बात स्वीकार की है कि वास्तव में कांग्रेस के साथ खटक जाने से ही अपनी पहचान बनाए रखन के लिए यह उद्यम जरूरी हुआ है। अपनी पहचान बनाए रखने वाला तर्क कांग्रेस का है, जो जमीनी हकीकत को अनदेखा कर अपनी औकात को बिल्कुल भूल कर उत्तर प्रदेश में सपा के साथ कोई भी तर्कसंगत समझौता करन को तैयार नहीं हुई थी। साझा सरकारों के युग में चुनाव के पहले सैद्धांतिक आधार पर मोर्चाबंदी की दुहाई देने वाली कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह की खुदगर्जी दिखलाई, उसके मद्दे नज़र सहयोगियों, समर्थकों और समानधर्मा साथियों का बिलटना और बिछुड़ना देर तक टाला नहीं जा सकता था। यहां कांग्रेस की मौकापरस्ती और दोहरे मानदंडों का (धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में) उल्लेख बेहद जरूरी है। बिहार में भी बिल्कुल नदारद होन के बावजूद यह हठ छोड़ा नहीं गया कि लालू अपने खात की सीटें उसे थमा दें। उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों ही जगह सत्तारूढ़ व्यक्ित और दल को चुनौती देने वाले मुलायम सिंह और लालू यादव हैं। इस बात को नकारना असंभव है कि इन दोनों राज्यों में इनके दलों की स्थिति आज की तारीख में अव्वल नहीं, दोयम ही हैं। कांग्रेस के साथ यदि कोई समझौता या सौदा पक्का हो जाता तब शायद मायावती और नीतीश कुमार का सरदर्द बढ़ता। यह भी साफ है कि मुलायम सिंह का कोई बुनियादी सरोकार बिहार की रस्साकशी नहीं है और न ही लालू यादव की कोई खास दिलचस्पी यूपी की कुश्ती में है। यह दोनों यादवकुलशिरोमणि न तो इस बिरादरी के अखिल भारतीय नेता हैं और न ही अन्य वंचित पिछड़ें इन्हें अपना मसीहा या रहनुमा समझते हैं। इसी कारण यादव-मुसलमान समीकरण बैठाना जीत सुनिश्चित करन के लिए अनिवार्य माना गया। दिक्कत यह है कि मुलायम सिंह को और उनके प्रमुख सलाहकार को यह लग रहा है कि यह पुराना नुस्खा मायावती का सिंहासन डावांडोल करन के लिए काफी नहीं। इसीलिए एक ओर अमर सिंह के नाते ठाकुरों से रिश्ता जोड़ा जाता है तो दूसरी ओर भाजपा से बिछुड़े कल्याण सिंह को गले लगाने में कोई हिचक नहीं होती है। सपा के चुनावी भविष्य के बारे में सबसे बड़ा सवालिया निशान कल्याण सिंह के आगमन के कारण ही लगा है। इसके बाद कोई बेहद नादान मुसलमान ही होगा, जो यह बात आंख मूंद कर, मुंह बंद रख गटक लेगा कि कट्टर धर्मनिरपेक्ष समझे जाने वालें अल्पसंख्यकों की पक्षधर सपा बदली नहीं है। जहां तक लालू का सवाल है, वह दौर कबका बीत चुका, जब एकमात्र यादव वर्ग के समर्थन से जीत सुनिश्चित हो सकती थी। बाकी सभी वंचित पिछड़ी जातियों में राजनैतिक चेतना बढ़ी है और इस बात का अहसास भी कि लालू यादव और उनकी राजद कुल मिलाकर उनकी उपेक्षा ही करते रहें हैं। पासवान का प्रभाव क्षेत्र भी निरंतर सिकुड़ता रहा है। आज मायावती की तुलना में वह दलित वोटबैंक को भुना सकने में काफी कमज़ोर नज़र आते हैं और प्रशासनिक अनुभव और योग्यता के बावजूद सत्ता में बने रहन के लिए या और ऊपर उठ सकन के लिए किसी न किसी का सहारा लेन को मजबूर हैं। मुलायम सिंह की कोई भी सरकार अपनी प्रशासनिक कार्यकुशलता के कारण मशहूर नहीं हुई। कुल मिलाकर समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ने वालें चेहरे पूंजीपतियों और अखबारों के रंग-बिरंगे पन्ना नंबर तीन में बिराजने वाली हस्तियों के ही नज़र आते रहे। उनकी सरकार अपराधी छवि वाले बाहुबलियों को प्रोत्साहित करने वाली ही लगती रहीं। उनकी तुलना में मायावती की प्रशासनिक सख्ती यूपी वालों को राहत दिलाने वाली हवा का झोंका महसूस हुई थी। यह जोड़ना बेहद जरूरी है कि समय बीतन के साथ मायावती की धमक पहले जैसी नहीं बची है और वह स्वयं भी अरबों के सरकारी सौदों में अपनी छवि बेदाग नहीं रख सकी हैं पर तब भी आम आदमी की नज़र में आज का उत्तर प्रदेश सपा वाले दौर स कम हिंसक, कम उत्पीड॥क और कम भ्रष्ट है। इसी तरह बिहार में अपनी तमाम सीमाओं और लाचारी के बावजूद नीतीश कुमार पटरी से बुरी तरह उतरी गाड़ी को जैसे-तैसे आगे खींचने में कमोबेश ईमानदारी के साथ जुटे रहे हैं और यह आरोप लगाना कि भाजपा के समर्थन के कारण उन्हें धर्मनिरपेक्ष नहीं समझा जा सकता है, बेमानी है। बिहार में निश्चय ही उनकी सरकार लालू-राबड़ी की तुलना में कही अधिक कार्यकुशल है और बहुजनहिताय काम करती दिखलाई देती हैं। इस बात को अनदेखा करना मूर्खता है कि भ्रष्टाचारमुक्त कार्यकुशल पारदर्शी सरकार के महत्व को आगामी चुनाव में यूपी बिहार का मतदाता मुद्दा निश्चय ही बनायेगा। यहां यह बात अच्छी तरह समझन की है कि भ्रष्टाचार हो या शांति या सुव्यवस्था अथवा पारदर्शिता, इनके बारे में आम आदमी अपना मन तुलना करके ही बनाता है, यह अच्छी तरह समझते हुए कि कोई भी आदर्श नहीं। हमाम में बैठे लोगों का जिक्र अक्सर होता है पर यह बात अक्सर भुला दी जाती है कि कुछ लोग बिल्कुल नंग-धडंग और बेशर्म नज़र आतें हैं और कुछ अपनी निर्वस्त्रता को दूर करन के लिए कुछ न कुछ करते दिखलाई देते हैं। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि जो तीन घटक एक नये मोर्चे के रूप में उभरन का दावा कर रहें हैं, वह वास्तव में कमज़ोरी का ही इजहार है। इसे किसी भी तरह से मौकापरस्त जोड़-तोड़ से इतर या बेहतर पहल नहीं समझा जा सकता। भारतीय जनतंत्र में एक नया मोड़ ता कतई नहीं। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसकी परेशानियां यूपी-बिहार तक सीमित नहीं। तमिलनाडु में पीएमके ने उसका दामन छोड़ दिया है और पूर्वोत्तर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी उसे ठुकरा चुकी है। आगे-आगे देखिए होता है क्या? माहिर वक़ील कपिल सिब्बल चाहे कितनी लफ्फााी झाड़ें, वह वक्त बहुत दूर नहीं जब वह बगले झांकते नज़र आयेंगे जब-जब जिक्र होगा साथियों, सहयोगियों और समर्थकों का-जिनके जान के बाद उनकी याद आई। श्चह्वह्यद्धश्चद्गह्यद्धश्चड्डठ्ठह्ल ञ्चद्दद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।

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