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ब्लॉग वार्ता : झोला खरीदो, झोला छाप बन जाओ

जब से तरकारी खरीदने वाला झोला लोगों की नार में छाप हो गया, झोला बदनाम हो गया। लोगों ने झोला देकर ब्रांडेड पोलीथीन के बैग ले लिये। दिल्ली में लोग पोलीथीन के उस झोल का इस्तेमाल कम करते हैं जिस पर सेल लिखा होता है। दफ्तरों में बड़े ब्रांड के पोलीथीन बैग लेकर आते हैं। कोई कपड़े के झोले में टिफिन नहीं लाता। स्टेटस सिंबल के मारे इन लोगों को मालूम भी है कि पोलीथीन से धरती मर रही है। द्धह्लह्लश्चज् द्दद्धह्वद्दद्धह्वह्लन्ड्ढड्डह्यह्वह्लन्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक कीजिए। घुघूती बासुती लिख रही हैं कि बाजार से लौटिये तो न जाने कितने तरह के पोलीथीन बैग घर आ जाते हैं। सब्जी वाला तो मिर्च और धनिय को भी अलग पोलीथीन में देता है। कपड़े का थैला लेकर जब भी घुघूती बासुती बाजार में निकलती हैं, स्टेटस सिंबल वाले लोग उन्हें घूरते हैं। अब तो गुटका, शैम्पू, तेल के पाउच ने भी आतंक मचा रखा है। हम हर दिन पोलीथीन की थैलियों को उड़ते देखते हैं मगर कोई फर्क नहीं पड़ता। पोलीथीन पर बैन तंबाकू सिगरेट पर बैन जैसा हो गया है। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक टाइप। इस हफ्ते हिंदी ब्लागिंग की दुनिया में चुनाव के साथ धरती की चिंता भी खूब है। भारत सहित दुनिया के देशों में चले धरती प्रहर कार्यक्रम की खूब चर्चा है। इसके तहत मार्च को रात साढ़े आठ बजे से लेकर साढ़े नौ बज के बीच कई शहरों की बिजली बंद कर दी गई। लोगों ने मोबाइल फोन बंद कर दिये। अरविंद मिश्रा साईंब्लग पर लोगों से अपील कर रहे थे कि इस अभियान से जुड़ जाइये। धरती मां का कर्ज उतारना है। लेकिन उसी मार्च को हमारे नेता हिंदुत्व और वरुण में व्यस्त रहे। किसी राजनेता ने धरती प्रहर की चर्चा नहीं की। वो इंटरनेट और ब्लाग के जरिये युवा मतदाताओं तक पहुंचने का ढोंग कर रहे हैं। पर्यावरण मुद्दा नहीं है। अरविंद मिश्रा अपने ब्लग में लिखते हैं जब सिडनी शहर में वर्ष में धरती प्रहर की शुरूआत हुई तो लाख लोगों ने अपने घरों की बत्तियां बुझा दीं। द्धह्लह्लश्चज् द्वड्डड्डह्लड्डह्यद्धrन्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक करते ही धरती प्रहर अभियान की पूरी जानकारी मिलती है। धरता प्रहर का मकसद है कि दुनिया के एक अरब लोग इसमें शामिल हो सकें। वन्य जीवों की रक्षा के लिए काम करने वाली संस्था वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड इस अभियान को बढ़ा रही है ताकि लोग देश, धर्म और जाति भूल कर धरती को बचान के काम की प्राथमिकता दें। ब्लॉगरों की जिस तरह की प्रतिक्रिया आई है उससे लगता है कि पर्यावरण हमारे लिए मुद्दा बन सकता है। लकिन कोई बनाना नहीं चाहेगा। हिंदुत्व वाले नेताओं को फिर गंगा में कूद कर सफाई करनी पड़ जाएगी। ये मेहनत का काम है। इस हफ्ते ब्लागिंग की दुनिया में वरुण गांधी की भी खूब चर्चा रही। तरह तरह के खेमे बने हुए हैं ब्लाग पर। लकिन कोई नहीं बता रहा है कि हिंदू धर्म को हुआ क्या है जिसे बचान के लिए वरुण जैसों की जरूरत पड़ गई है। किसे गर्व नहीं होता अपनी संस्कृति और धर्म पर। वरुण गांधी अलग से क्यों चिल्ला रहा है कि उसे गर्व है। कहीं वरुण गांधी अपनी हीन भावना का तो इलाज नहीं कर रहे हैं। द्धह्लह्लश्चज् 2ड्डह्न्ह्लद्धड्डन्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक कीजिए तो यहां एक दिलचस्प दलील मिलती है। ब्लगर शान इस बात से परेशान हैं कि इस चुनाव में जहां सिर्फ आडवाणी आडवाणी होना चाहिए था वहां अब गांधी-गांधी हो रहा है। इसमें दोनों गांधियों का फायदा हो रहा है। राहुल गांधी और वरुण गांधी। शान कहते हैं कि ऐसा लगता है कि भारत में एक ही परिवार बचा है जिसे राजनीति आती है। उसी तरह से भारत में चाहे कितनी भी पार्टियां हो जाएं राष्ट्रीय पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस ही कहलाती हैं। दोनों तरफ गांधी रहेंगे तो चर्चा गांधी परिवार की ही होगी न। द्धह्लह्लश्चज् श्चड्डrह्यद्धह्वrड्डद्व२७.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक करते ही एक ब्लाग खुलता है जिसका नाम है त्यागी। त्यागी जी को लगता है कि वरुण गांधी के बहाने एक हजार साल का गुबार निकला है। त्यागी जी किसी मुस्लिम अत्याचार की घोर आशंका से पीड़ित हैं। उनके हिसाब से गली गली में हिंदू मुस्लिम अत्याचार से पीड़ित है। इनका जिक्र इसलिए कर रहा हूं ताकि आप भी अपनी गली में झांकिये और देखिये कि कहां कहां अत्याचार है। इसी तरह की झूठी आशंकाओं के दम पर मुसलमानों के बारे में एक झूठा डर खड़ा किया जाता है और फिर मंच पर लाया जाता है वरुण गांधी। पहली बार नहीं हो रहा है। आप बस धरती को बचाइये और हर तरह के प्रदूषण से बचिये। rड्ड1न्ह्यद्ध ञ्चठ्ठस्र्ह्ल1.ष्oद्व लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म. ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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