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ध्यान की उत्कृष्ट स्थिति

चित्त और मन एक है या दो? यह एक प्रश्न है। सामान्यत: इन दोनों शब्दों का प्रयोग एक अर्थ में किया जाता है। वस्तुत: चित्त मूल तत्व है। मन को उत्पन्न किया जाता है। जो मूल तत्व है, चेतना है, आत्मा है, वह न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है। मन उत्पन्न होता है, इसलिए यह नष्ट भी होता है। मन मूर्तिमान है, चित्त अमरूत्त है। चित्त और मन के अंत के अंतर को समझना जरूरी है। इसे समझे बिना ध्यान को नहीं समझा जा सकता। मनुष्य के सामने एक समस्या है कि वह परेशान रहता है। परेशानी का कारण मन है। मन को पैदा किया और परेशानी खड़ी हो गयी। अंधे को न्योतने का अर्थ है दो व्यक्ितयों को भोजन कराना। क्यों अंधे को न्योते और क्यों दो को भोजन कराए? क्यों मन को पैदा करे और क्यों परेशानी उठाए? ‘स एकाकी न रेमे’ - ब्रह्मा के लिए कहा जाता है कि वह अकेलेपन से ऊब गया है। मन भी अकेला नहीं रहता। वह आता है तो अपने साथ मुसीबतों का समूह लेकर आता है। मनुष्य के पास मन को पैदा करने की शक्ित है। उसमें वह सामथ्र्य भी है कि वह मन को पैदा न होने दे। दोनों शक्ितयों की तुलना की जाए तो वह शक्ित विशिष्ट है, जो मन को पैदा न होने दे। बात करने की शक्ित का महत्व है। पर शक्ित प्राप्त होने के बाद भी न बोले, उसका महत्व अधिक है। महाकवि कालिदास ने कहा हैड्ढr - ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्यय:।ड्ढr - ज्ञान प्राप्त कर मौन रहना, शक्ित-संपन्न होकर सहन करना और मुक्त हाथों से दान देकर प्रशंसा से दूर रहना बहुत बड़ी उपलब्धि है। मन को पैदा करने का अर्थ है विचारों को पैदा करना। निर्विचार रहने के लिए मन से ऊपर उठना होगा। उसके लिए अभ्यास करना होगा। एक मिनट, चार मिनट, जितनी देर संभव हो। निर्विचार रहने का अभ्यास किया जाए। एक बार अभ्यास से क्या होगा? बार-बार अभ्यास किया जाए। ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ - अभ्यास करने से मूर्ख व्यक्ित भी ज्ञानी बन जाता है। इसी प्रकार अभ्यास से मन को साधा जा सकता है। जो व्यक्ित ऋजु होता है, ग्रहणशील होता है, विनम्र होता है, वह गुरुआें के मार्गदर्शन में आगे बढ़ता रहता है। पर अल्पज्ञ व्यक्ित ज्ञान के दर्प में किसी को कुछ नहीं समझता। राजर्षि भर्तृहरि की इस अनुभवप्रण अभिव्यक्ित को नीतिशतक में पढ़ा जा सकता है। जब मैं अल्पज्ञ था तो मदोन्मत्त हाथी की तरह ज्ञान के दर्प में अंधा हो गया। उस समय मैं अपने आपको सर्वज्ञ समझने लगा। जब मैंने सुधी जनों के सान्निध्य में रहकर थोड़ा ज्ञानार्जन किया, तब मुझे बड़ी मूर्खता का बोध हुआ। मेरा मद ज्वर की तरह उतर गया। अहं साधना के क्षेत्र में सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा को पार करने वाला मन को जीतता है। मन को जीतने वाला निर्विचार बनता है। निर्विचारता ध्यान की उत्कृष्टता स्थिति है। इसी स्थिति में साधक अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल होता है।

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