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खत्म होने लगी ‘दाल का कटोरा’ में चने की खेती

‘दाल का कटोरा’ के नाम से चर्चित राज्य के टाल और दियारा क्षेत्र में चना की खेती अब समाप्त होने लगी है। कभी सर्वाधिक लाभदायक माने जाने वाले चने की खेती ने पिछले कुछ वषरे में किसानों की कमर तोड़ दी है और अब किसान इससे मुंह मोड़ने लगे हैं। वैसे तो पूरे राज्य में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होती जा रही है, लेकिन टाल-दियारा क्षेत्रों से तो चना गायब ही होने लगा है। नतीजा यह है कि उपभोक्ताआें की मांग को पूरा करने के लिए बाजार को छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों पर निर्भर करना पड़ता है।यह स्थिति चने की फसल में लगने वाले कीड़ों की वजह से तो उत्पन्न हुई ही है टाल क्षेत्र में मुहानों के भर जाने से भी किसानों को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है। कृषि विभाग के सूत्र बताते हैं कि राज्य भर में लगभग एक लाख 68 हजार हेक्टेयर में चने की खेती होती है।ड्ढr ड्ढr इसमें एक लाख हेक्टेयर में फैले टाल क्षेत्र का बड़ा योगदान था। टाल क्षेत्र में होने वाली दलहनी फसलों में पहले 60 प्रतिशत चना की फसल होती थी। अब यह प्रतिशतता घटते-घटते पांच फीसदी तक पहुंच गई है। सरकार भी इस स्थिति से वाकिफ है । तभी तो गत वर्ष जनवरी माह में हुई अधिकारियों की बैठक में टाल क्षेत्र में चने की वैकल्पिक दलहन फसल के रूप में मसूर की खेती को बढ़ावा देने पर विचार हुआ था। कीड़ाखोरी और जलनिकासी में होने वाले विलंब से आजिज किसानों ने सरकार के इसी विचार को आत्मसात कर लिया और इस वर्ष बड़हिया-मोकामा टाल में लगभग 0 फीसदी किसानों ने मसूर की खेती की है। ड्ढr ड्ढr बड़हिया के विपुल कुमार, मुटानी सिंह और संजय सिंह बताते हैं कि टाल क्षेत्र से पानी निकासी करने वाला मुहाना ऊंचा हो गया है। आम तौर पर चने की खेती 15 अक्टूबर से शुरू हो जाती है और तब तक पानी निकल जाता था। इसबार मुहाना भर जाने के कारण पानी निकलने में काफी बिलंब हुआ। फलत: मसूर की खेती करना किसानों की विवशता हो गई। उधर अधिकारी कहते हैं कि इस वर्ष वर्षा अधिक होने से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई। अधिकारिक सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार गत वर्ष सरकार ने टाल क्षेत्र की पइनों की उड़ाही के लिए 28 करोड़ रुपये स्वीकृत किये थे जिससे 57 पइनों की उड़ाही की गई थी। सूत्रों के अनुसार उड़ाही से वंचित वही छह पइन वंचित रह गयीं थीं जो तकनीकी रूप से अनुपयोगी थे।ं

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