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राज चिकित्सालय में हुए थे 50 प्रत्यारोपण

आज सुर्खियों में भले ही गुड़गांव छाया हो मगर बिहार भी मानव अंगों की खरीद-फरोख्त का बड़ा और कुख्यात बाजार रहा है। मानव अंगों की तिजारत के लिए यहां तो दलालों ने एक बड़ा तंत्र ही खड़ा कर लिया था। इसका भंडाफोड़ होने के बाद ही राजधानी की पॉश कॉलोनी स्थित राज चिकित्सालय तो हमेशा के लिए बन्द हो गया लेकिन किडनी काव्यापार चोरी छिपे जारी रहा। नब्बे के दशक में इस चिकित्सालय में अवैध रूप से 50 से अधिकमरीजों का किडनी प्रत्यारोपण हुआ था।ड्ढr ड्ढr ताजा घटनाक्रम में स्वास्थ्य विभाग के अधीन गठित किडनी प्रत्यारोपण समिति के समक्ष मंगलवार को एक अविवाहित युवक पहुंचा। वह अमेरिका में रहनेवाले किसी मरीज को किडनी ‘दान’ करना चाहता था जिसपर सचिवालय स्थित अंग प्रत्यारोपण सत्यापन समिति ने आपत्ति दर्ज करते हुए मेडिकल बोर्ड की आगामी बैठक में स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने को कहा। यह नौजवान मुजफ्फरपुर जिला का रहनेवाला है। यह तो एक महज एक बानगी है। बिहार में किडनी रैकेट का सबसे बड़ा भंडाफोड़ 1में हुआ था। बोरिंग रोड स्थित राज चिकित्सालय में किडनी रैकेट पकड़ा गया था। राज्य में उस समय मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम लागू नहीं था।ड्ढr ड्ढr मुम्बई में अधिनियम लागू होने के बाद राज चिकित्सालय के संचालक ने पटना को ही अपना अड्डा बना लिया था। जानकारों का कहना है कि अस्पताल के तीसरे तल्ले पर किडनी ट्रांसप्लांट होता था। ट्रांसप्लांट होने के एक सप्ताह पूर्व और बाद में किसी को भी तीसरे तल्ले पर जाने की अनुमति नहीं होती थी। अस्पताल में मरीजों की भीड़ नहीं रहती थी। थोड़े दिनों के बाद अचानक चिकित्सालय खुलता था और चिकित्सकों की टीम के साथ 15-20 लोग इकट्ठे होते थे। आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले विदेशी होते थे। अक्सर किडनीदाता भी राज्य के बाहर के ही होते थे। चिकित्सकों की टीम मुम्बई से बुलायी जाती थी। सुरेन्द्र चोपड़ा सहित तीन भाई इस संस्थान के संचालक थे। तीनों भाइयों के पैसे की आपसी लड़ाई में किडनी रैकेट का भंडाफोड़ हुआ था। इसको लेकर पाटलिपुत्र थाने में प्राथमिकी भी दर्ज करायी गयी थी।ड्ढr ड्ढr रैकेट उजागर होने के बाद तीनों भाई पटना छोड़कर भाग गये। आईजीआईएमएस में भी एक किडनी का दलाल वर्ष 2002 में पकड़ा गया था। वह किडनी के ग्राहकों की तलाश करते पकड़ा गया था। सारण जिला के बाहर रहनेवाले दर्जनों मजदूरों की किडनी निकालने का मामला उजागर हो चुका है। सूत्रों की मानें तो आज भी राजधानी व सूबे के कुछ बड़े निजी क्लीनिकों में इस तरह का गोरखधंधा चोरी छिपे चल रहा है। चूंकि किडनीदाता अपनी आर्थिक मजबूरियों की वजह से मुंह खोलने को तैयार नहीं होता इसलिए पुलिस के हाथ बड़े निजी क्लीनिक संचालकों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं और मानव अंगों के प्रत्यारोपण का यह धंधा ‘दान’ के आवरण मंे चल रहा है। गुर्दा प्रत्यारोपण का ‘महारथी’ डा. राजेशड्ढr पटना (हि.प्र.)। गुड़गांव मंे हुए दिल दहलाने वाले किडनी रैकेट के भंडाफोड़ में शामिल डा.राजेश के लिए यह पहली घटना नहीं है। दानापुर निवासी यह चिकित्सक इसके पूर्व भी किडनी रैकेटों में चर्चित रहा है। जानकारों का कहना है कि वह हाल तक मुजफ्फरपुर में गुमनामी का जिन्दगी गुजार रहा था। बताया जाता है डा.राजेश गुप्ता ने रांची मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की परीक्षा पास की। उसने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से मास्टर ऑफ सर्जरी की। आरम्भ से ही वह मेधावी था। जानकारों का कहना है कि उसने बत्रा हॉस्पीटल में किडनी प्रत्यारोपण का प्रशिक्षण लिया। अपनी प्रतिभा और कौशल को विकसित कर उसने किडनी ट्रांसप्लांट में महारत हासिल कर ली। इसी दौरान नोयडा में हुए किडनी रैकेट में उसका नाम उजागर हुआ। जानकारों की मानें तो वह इस मुकदमे को आज भी झेल रहा है।ड्ढr ड्ढr डा.राजेश का नाम रांची के डा. एस. एस. प्रसाद के यहां पकड़े गये किडनी रैकेट में भी उछला था। इसमें डा.प्रसाद को किडनी ट्रांसप्लांट के जुर्म में जेल की हवा खानी पड़ी थी। एक के बाद एक किडनी रैकेट में नाम उछलने के बाद भी वह अपने को निर्दोष बताता रहा था। हालांकि किडनी ट्रांसप्लांट में महारत हासिल करनेवाले डा. राजेश की प्रैक्िटस कभी जोर नहीं पकड़ी। परिवारवालों की नसीहत पर उसने मुजफ्फरपुर में क्लीनिक खोला। जानकारों का कहना है कि वह हाल तक मुजफ्फरपुर में ही प्रैक्िटस कर रहा था। थोड़े दिन पहले उसने पटना के विद्यापति मार्ग में भी क्लीनिक खोलकर प्रैक्िटस करने की कोशिश की मगर पैसे की ललक में वह गुड़गांव पहुंच गया।

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