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हृदय का भागवत

महाप्रभु वल्लभाचार्य भागवत को लेकर अभिभूत थे। शायद इसीलिए उनके सूर ने उसके आधार पर इतने बेहतरीन पदों की रचना की। वह कहते थे कि व्यास ने सचमुच कमाल किया है भागवत लिख कर। भागवत को वह व्यास की ‘समाधिभाषा’ कहते थे।मुझे तो भागवत हृदय की भाषा लगती है। व्यास ने उसे अपने दिल से लिखा है। दरअसल, जब व्यास ने अपने दिल की सुनी, तो भागवत लिखा। वह जीवनभर अपने दिमाग की ही सुनते रहे थे। उस दिमाग ने उन्हें महाभारत जैसी रचना बुनने मंे मदद की थी। लेकिन उससे मन शांत नहीं हुआ। जीवन आधा-अधूरा सा ही रहा। उन्हें असीम शांति का अनुभव तब हुआ, जब भगवान की लीला में डूबे। यह ब्रह्मांड प्रभु का ही लीलाधाम है। ऐसा भक्ित के आचायरे का मानना है। भक्त तो इस बात को दिल से लगा कर रखते हैं। भक्ित का कुल मिला कर फंडा यह है कि भगवान उसके हैं। वह परमपिता जरूर हैं। वह बहुत ऊंचे पायदान पर जरूर हैं, लेकिन बिल्कुल ही अलग- थलग नहीं हैं। वह कोई ऐसा जीवन नहीं जीते जिसकी भक्त सोच भी नहीं सकता। यह जरूर है कि जो भी करते हैं उसके प्रभु वह बेहतरीन होता है। वह सर्वश्रेष्ठ हैं। लेकिन जीते उसकी जैसी ही जिन्दगी हैं। भगवान उसके क्या नहीं हैं? माता, पिता, भाई, बंधु, सखा और न जाने क्या-क्या! हम अपने मानवीय जीवन में जो कुछ भी बेहतरीन देख सकते हैं, वही हैं भगवान। अपने जीवन में जो भी बेहतरीन है वही भगवान है। प्रभु के नजदीक होने के अपने यहां तीन रास्ते माने जाते हैं यानी ज्ञान, कर्म और भक्ित योग। इन तीनों में यह समाज भक्ित योग में ही सबसे ज्यादा डूबा है। डुबाती तो भक्ित ही है न। अपने अहम को विसर्जित करने के लिए डूबना जरूरी है। यह भक्ित ही है, जिसमें हम खुद अपने अहम को विसर्जित कर देते हैं। असल में भक्त ने ही भगवान को मानवीय बना दिया है। उसे मानवीय बनाए बिना भक्त को चैन कहां? उससे लीला कराए बिना भक्ित कहां होती है? नीत्शे जिस नाचते-गाते देवता की बात करते हैं उसे पश्चिम में तो नहीं, लेकिन यहां तो आसानी से देखा जा सकता है। आखिर कृष्ण से बेहतर नाचते-गाते देवता और कौन हो सकते हैं? नाचते-गाते यानी जिन्दगी से भरपूर देवता। भागवत उन्हीं कृष्ण की लीला है। हमारे भक्ित आंदोलन को सबसे ज्यादा आंदोलित ही भागवत ने किया है। गीता, महाभारत से हमारा चिंतक प्रभावित तो होता रहा, लेकिन जब उस चिंतन को अपनी रचना या समाज में उतारने की बात आई, तो उसे भागवत ही नजर आया। अपने यहां भागवत के आधार पर जितनी रचनाएं हुई हैं, शायद ही किसी और ग्रंथ को ले कर हुई हों। भागवत अपने भगवान की लीलाआें का धाम है। परमपिता को मानवीय तौर पर देखना हो तो भागवत में देखना चाहिए। कभी सोचता हूं कि अगर अपनी संस्कृति से कृष्ण को हटा दें तो क्या बचेगा? कला, साहित्य, संगीत, स्थापत्य..सब पर नए सिरे से सोचना होगा। कल एकादशी है। यही एकादशी है जिसे भागवत के साथ जोड़ा जाता है।ं

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