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सेना के साए में जम्हूरियत की जंग

पाकिस्तान में 18 फरवरी को चुनाव होने हैं। लेकिन इस राह में अड़चनें कम नहीं हैं। देश की राजनीति पर नजर रखने वाले कई पाकिस्तानी विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सुरक्षा हालातों का हवाला देकर मुशर्रफ चुनावों को टाल सकते हैं। 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर पर फिदायीन हमले के बाद देश के सुरक्षा बलों पर अब तक चार से अधिक बड़े हमले हो चुके हैं। ऐसे में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की गारंटी कैसे ली जा सकती है? ऐसे हमले देश की अंदरूनी हालात की कोई उजली छवि तो नहीं ही पेश कर रहे हैं। पाकिस्तान से लगाव रखने वाले अधिकतर लोगों का मानना है कि देश जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें किसी भी चुनाव के लिए न्यूनतम स्तर की स्थिरता तो होनी ही चाहिए। ऐसे में चुनाव होंगे, लेकिन संगीनों के साये में। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल तैनात होंगे जैसा कि नब्बे के दशक के आखिरी दौर में जनगणना के दौरान किया गया था। राष्ट्रपति मुशर्रफ के बयान से तो ऐसा ही लगता है। उन्होंने कहा है कि चुनाव के पहले हो या फि र बाद में, कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। क्या जनरल कियानी सेना की सरपरस्ती में होने वाली इस सिविल कवायद को पसंद करेंगे। ऐसा माना जा रहा है कि सेना इस कवायद से अपना दर्जा घटा हुआ मान रही है। उसे लग रहा है वह पुलिस की तरह काम करने को मजबूर है। बेनजीर की हत्या के बाद जिस सहानुभूति लहर की बात की जा रही थी वो भी अब खत्म होती दिखाई दे रही है। बेनजीर की विरासत और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पर उनके परिवार के वर्चस्व को भी चुनौती मिलनी शुरू हो गई है। बेनजीर के मरहूम भाई मुर्तजा भुट्टो की बेगम जैसे भुट्टो परिवार के दूसरे सदस्य ही विरोध की आवाज उठाने लगे हैं। वजीरिस्तान और संघीय शासन वाले कबाइली इलाकों पर गौर किया जाए, तो ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी फौज की सीधी कार्रवाई से अमेरिका के सामने मुशर्रफ की स्थिति मजबूत हुई है। फौजी कार्रवाई से विद्रोहियों को बड़ा झटका लगा है और अब उन्हें छुप कर लड़ने में मुश्किलें आ रही हैं। लगातार तेज हो रहे हमले से बचने के लिए वो छुपने के दूसरे ठिकाने ढूंढ़ रहे हैं। जनवरी के मध्य तक फौज की सीधी कार्रवाई ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि मुशर्रफ अमेरिका को यह संदेश देने में सफल रहे। आतंक के खिलाफ जारी जंग में वह कितने गंभीर हैं। सब कुछ बुश के ही मुताबिक हो रहा है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई के दौरान मुशर्रफ को अमेरिका के सामने कोई बड़ा शिकार पेश करना होगा ताकि उन्हें मिल रहा समर्थन जारी रहे। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के कर्ताधर्ता की इच्छा तो यही है कि राष्ट्रपति चुनाव के ठीक पहले मुशर्रफ कुछ ऐसा करिश्मा कर दिखाएं कि अमेरिकी वोटरों की भावनाओं को भुनाया जा सके। फरवरी में मुशर्रफ अगर चुनाव करा भी लेते हैं, तो पूरी संभावना है कि राष्ट्रीय और प्रांतीय असेंबलियों में रेडिकल इस्लामी ताकतों का कब्जा हो जाए। देश में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें जिस तरह लोगों के बीच अपना अभियान चला रही हैं वैसा न तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग कर पा रही है। इससे यह भी साफ हो गया है कि देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ लगातार चलाए जा रहे सेना के अभियान की वजह से उसके नुमाइंदे जनता के बीच अपनी साख खो चुके हैं। ऐसे हालात में कट्टरपंथी इस्लामी दलों और सेना की सरपरस्ती वाली पीएमएल (क्यू) जैसी पार्टी की चुनावी सफलता की संभावना प्रबल हो गई है। मुशर्रफ के लिए यह सबसे अच्छी स्थिति होगी क्योंकि इस्लामी दलों और पीएमएल (क्यू) दोनों को सेना का खासा समर्थन मिलता रहा है। पाकिस्तानी राजनीति पर नजर रखने वाले एक विश्लेषक की टिप्पणी देखिए- देश के जिस भी राजनेता ने सेना से पंगा लेने की कोशिश की, उसका राजनीतिक भविष्य हमेशा के लिए गर्त में चला गया। नवाज शरीफ इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। अस्सी के दशक में वह अदना व्यापारी थे, जिसकी स्थानीय राजनीति में थोड़ी बहुत पकड़ थी। जियाउल हक ने अस्सी के दशक के आखिरी दौर में उन्हें पैसे और दूसरे संसाधन मुहैया कराए ताकि वो बेनजीर की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को टक्कर दे सकें। नवाज शरीफ और उनकी पार्टी ने 10 में चुनाव जीता और 1तक वह सेना के मर्जी के मुताबिक ही चलते रहे। अक्तूबर 1में उनका तख्ता पलट दिया गया और लोगों के सामने वह अपनी विश्वसनीयता खो बैठे। उन पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाए गए। पाकिस्तान के इस इतिहास पर नार डालने के बाद तो ऐसा नहीं लगता कि जम्हूरियत लौटने की अवाम की आस पूरी हो पाएगी। अगर अगले महीने चुनाव होते हैं तो ऐसे ही लोग चुन कर आएंगे, जिन्हें सेना पसंद करती है। ऐसे नतीजों से अमेरिका को भी गुरेज नहीं होगा क्योंकि आतंक के खिलाफ उसका युद्ध चलता रहेगा और उसकी यह उम्मीद भी बनी रहेगी कि अगले कुछ महीनों में तालिबान के बड़े सरगना या अलकायदा के मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन जैसे लोग पकड़ लिए जाएंगे। मुशर्रफ समर्थक लॉबी का तो यह तक कहना है कि मुशर्रफ को गद्दी पर रहने के लिए ऐसी किसी सफलता की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। उनका मानना है कि मौजूदा हालात में मुशर्रफ को समर्थन देने के अलावा अमेरिका के पास और कोई चारा नहीं है। अब हमारे यहां साउथ ब्लॉक के आकाओं के बीच यह माथापच्ची चल रही है कि पाकिस्तान में उभर रहे इस नए गठजोड़ से कैसे निपटा जाए। कुछ तो निजी बातचीत में बताते हैं कि भारत की पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति में कतई दिलचस्पी नहीं है। पिछले दिनों ऐसा हुआ भी है। प्रधानमंत्री ने कई बार यह कहा है कि सिविल वर्दी में बैठे जनरल के साथ काम करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। बहरहाल, पाकिस्तान की राजनीति में सेना का वर्चस्व कम होने वाला नहीं है और मुशर्रफ का इस पर पूरा नियंत्रण है। ऐसे हालात में भारत को पल-पल बदलती पाकिस्तान की राजनीति पर पैनी नार रखनी होगी। पाकिस्तान के बदलते राजनीतिक हालत से तालमेल बिठाने के लिए उसे अपने विकल्प भी खुले रखने होंगे। लेखक प्रमुख रक्षा विशेषज्ञ हैं

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