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चित्त की क्षमता

हा जाता है कि चित्त को बदलने से प्रवृत्ति बदल सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि हमारी प्रवृत्ति से चित्त बदल जाता है। यह कुछ सीमा तक इस प्रकार सच है कि चित्त प्रवृत्ति को संगत बताने के कारण देता है। अत: चित्त प्रमुख प्रवर्तक है, वह मनुष्य की सोच की दिशा तय करता है। यह चित्त ही है, जो चाहे तो हमें ईश्वर की आेर जाने में सहायता दे सकता है, या निर्थक अस्तित्व में फंसाए रख सकता है। चित्त में विश्वास हो, तो रोगी भगवान की विभूति से भी अपने को स्वस्थ समझने लगता है। खेल का मैदान इसका प्रमाण देता है। हारते हुए खिलाड़ी को जब अपने दल की जोश भरी बढ़ावा देती आवाज सुनाई देती है, तो वह बाजी पलटने में सफल हो जाता है। चित्त शक्ित देता है, तो वह हार का कारण भी बन सकता है। तभी कहा जाता है कि मन के मारे हार हैमन के जीते जीत। प्रत्येक प्राणी के अंतस में शक्ित होती है, जो अनुशासित जीवन से बढ़ती है, जबकि डर उसकी सहज क्षमता को खत्म कर देता है। व्यक्ित को यह प्रार्थना करनी चाहिए कि उसका चित्त उसे हार और डर की प्रवृत्ति से हटाकर उपलब्धि और जीत की दिशा में ले जाए। कोई दो व्यक्ित एक से नहीं होते, प्रत्येक के चरित्र और जीवन का नया अर्थ होता है, उसकी क्षमता भिन्न और अनूठी होती है। अपने कर्म द्वारा वह उस अर्थ को सार्थकता देता है। चित्त स्वस्थ और शांत होता है, तो जीवन अर्थपूर्ण और लक्ष्यसमर्पित होता है। अन्यथा उसमें एक खालीपन भर जाता है। यह खालीपन बहुत बार शारीरिक बीमारियों का कारण बनता है। चित्त की अस्वस्थता से शरीर ही नहीं, आत्मा भी बीमार हो जाती है। डाक्टरों के अनुसार पिचहत्तर फीसदी बीमारी अपनी चित्तदशा को बदल कर स्वस्थ हो सकते हैं। अधिकांश बीमारियों का कारण व्यक्ित की रुग्ण मानसिकता होती है। सही जीवन पद्धति, अच्छी मानसिकता और आध्यात्मिक प्रवृत्ति से कई बार शारीरिक कष्ट दूर हो जाते हैं। ये तत्व शरीर को अच्छे भोजन की तरह पुष्ट करते हैं, जबकि डर जहर की तरह उसे नष्ट करता है। घर या आसपास कोई बीमार हो, जिन्दगी और मौत के बीच जूझ रहा हो, तब प्रियजन डर या चिन्ता से कोई मदद नहीं कर सकते। जीवन के सारे नकारात्मक तत्व व्यक्ित की शक्ित खींच कर उसे दुर्बल बनाते हैं, जबकि स्पष्ट बुद्धि और अटल विश्वास स्वस्थ न भी कर सके तो भी स्थिति का सामना करने की हिम्मत जगा देता है। हिम्मत जगाने का काम यह चित्त ही कर सकता है। गीता में अर्जुन ने कृष्ण से कहा, ‘चित्त बहुत चंचल, उद्वेगकारक और दुराग्रही है। इसे वश में करना वायु को वश में लाने के समान है।’ तब कृष्ण ने एक सरल उपाय बताया, ‘निरंतर अभ्यास और अनासक्ित से चित्त को वश में किया जा सकता है।’ उपलब्धि नहीं, पर चेष्टा हर व्यक्ित के हाथ में है।

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  • Web Title: चित्त की क्षमता