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महिलाओं ने तोड़ा सूदखोरों का जाल

र्ज-मर्ज, ब्याज-छियाज, बेबसी और बदहाली के बीच बुन्देलखण्ड में एक नखलिस्तान भी है। ऐसा नखलिस्तान जहाँ न साहूकारों के फंदे हैं और न ही गिरवी-गिरोह का जानलेवा जाल। कुछ है तो महिलाओं की गाँठ में बँधी रेजगारी जो मौका पड़ने पर बड़ी मुश्किलों को हल करने का बायस बनती है। फिर टपरियन गाँव की शीलरानी हो या पिसानी गाँव की कस्तूरीबाई या फिर बम्हौरी की सुनीता हो या रमुइया। कारोबार का भले ही ‘क’ न जानती हों लेकिन सूदखोरों के चंगुल से निकलने की उनकी जंग इस पिछड़े इलाके में उम्मीद की एक बड़ी किरण बन कर उभरी है।ड्ढr अब बात अंधेरी जिन्दगी में रंग भरती चंद महिलाओं की। ललितपुर से टीकमगढ़ की ओर बढ़िए तो तकरीबन सौ किलोमीटर दूर महरौनी के घने जंगलों में सहरिया आदिवासी रहते हैं। महिलाएँ दिन भर जंगलों में लकड़ी बीनती हैं लेकिन फिर भी दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पातीं। ऊपर से साहूकार की चाकरी अलग। लेकिन अब ऐसा नहीं है।ड्ढr

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