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भारत विरोध पर खड़ी नेपाल की राजनीति

नेपाल की राजनीति का रिमोट कंट्रोल इस समय कोइराला के हाथ में है, या प्रचंड के, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन शासनाध्यक्ष के रूप में किसी भी देश से संवाद के लिए कोइराला ही अधिकृत व्यक्ित माने जाएंगे। नेपाल के लोकतंत्र में जिन लोगों की थोड़ी-बहुत आस्था रही है, वे कोइराला को राजनीति का महानायक मानते रहे हैं। लोग अपने इस 84 साल के महानायक के अतीत को लेकर सन्नाटे में हैं। किसी ने आरोप नहीं लगाया, बल्कि गिरिजा बाबू ने स्वयं कहा है कि वे जाली नोट छापने, सोने की तस्करी और विमान अपचालन जैसे जघन्य कारनामों को अंजाम दे चुके हैं। इसके लिए उनके बड़े भाई वी. पी. कोइराला की सहमति थी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला की मृत्यु 1में हो गई थी। उन्हें नेपाल का गांधी माना जाता है। जिन लोगों ने 16 जनवरी को कांतिपुर टेलीविजन पर गिरिजा बाबू का साक्षात्कार देखा-सुना है, उनके लिए यह दुविधा की स्थिति है कि वे वी. पी. को नेपाल का गांधी माने, या गोडसे? वी. पी. ने अपने जीवनकाल में जो जानकारी दी थी, उस पर भरोसा करें तो राणा शासन की समाप्ति के लिए उन्होंने कभी अहिंसा का रास्ता चुना ही नहीं था। यह अच्छी बात है कि नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार किया कि वे भारतीय क्षेत्र में रहते हुए भारत का जाली नोट छापते थे, और सीमाई इलाकों में चलाते थे। यह खबर अखबारों और मीडिया चैनलों के लिए सुर्खियां बनी थीं। लेकिन भारत सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। किसी भी थाने में जाली नोट चलाने वाले अभियुक्तों के खिलाफ मामला दर्ज नहीं हुआ है। न ही कोई देशभक्त अदालत के दरवाजे पर दस्तक देने गया। कोइराला के इस बयान से पहले हम सब इसी मुग़ालते में थे कि नेपाल सीमा के आर-पार भारतीय जाली नोट का कारोबार आईएसआई की शह पर होता रहा है। पता नहीं कोइराला का यह कहना कि जून 1में नेपाल एयरलाइंस के विमान का हाइजैक तत्कालीन रॉ चीफ आर. एन. कॉव की हरी झंडी पर किया था, कहां तक सही है। हालांकि बयान के इस हिस्से को उन्होंने प्रसारण से पहले हटवा दिया था, लेकिन यह याद रखने की बात है कि इस कांड के मुख्य अभियुक्तों में से एक, चक्र प्रसाद वास्तोला को जब भारत में नेपाल का राजदूत नियुक्त किया गया था, तब नई दिल्ली को आपत्ति हुई थी। वास्तोला भारत से लौटने के बाद नेपाल के विदेशमंत्री भी बने थे। यों भी भारत सरकार ऑन द रिकॉर्ड यह स्वीकार नहीं कर सकती कि जून 1में राष्ट्र बैंक के 40 लाख नोटों के साथ विराट नगर से काठमांडो जा रहे विमान के अपचालन में रॉ की कोई हामी रही है। आरोप लगाने वाले यहां तक कह जाते हैं कि 20 जून 1े सीरियल विस्फोटों के लिए भी रॉ ने हरी झंडी दी थी। इसकी जिम्मेदारी नेपाल जनवादी मोर्चा के अध्यक्ष रामराजा प्रसाद सिंह ने ली थी, जो पटना में रह रहे थे। फिर भी यह नेपाल का आंतरिक मामला था, जिससे भारत का कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। वैसे, 1से लेकर अब तक नेपाल में विस्फोटों की लंबी श्रंखला है। 30 जनवरी को ताजा सीरियल विस्फोट सीमावर्ती शहर बीरगंज में हुआ। संभव है कि इसके लिए भी रॉ को टोपी पहना दी जाए। लेकिन ऐसी अफवाहों को आधार देने के लिए स्वयं रॉ के लोग जिम्मेदार नहीं हैं? काठमांडो से प्रकाशित जनदिशा साप्ताहिक ने खबर दी कि पिछले 14 दिसम्बर को 3 बजकर 45 मिनट पर जेट एयरवेज की फ्लाइट से रॉ प्रमुख अशोक चतुर्वेदी त्रिभुवन हवाई अड्डे पर उतरे। उसी दिन दूसरी फ्लाइट से नेपाल स्थित भारत के राजदूत शिवशंकर मुखर्जी आए। 21 दिसम्बर के इश्यू में जनदिशा ने रॉ प्रमुख की प्रधानमंत्री कोइराला, गृहमंत्री के. पी. सितौला, नेपाली कांग्रेस के नेता शेखर कोइराला से भेंट की तफसील छापी। एक और साप्ताहिक ‘नेपाली पत्र’ ने रॉ प्रमुख चतुर्वेदी के हयात रीजेंसी होटल में ठहरने से लेकर एमाले नेता माधव कुमार नेपाल राष्ट्रीय जनशक्ित पार्टी के नेता सूर्य बहादुर थापा से मिलने की खबर छापी। कांतिपुर प्रकाशन से जुड़े ‘नेपाली वीकली’ ने तो भारतीय दूतावास में कार्यरत कई लोगों के नाम छापे और दावा किया कि ये सभी रॉ के एजेंट हैं। कूटनीति की नब्ज को पहचानने वाले मानते हैं कि मीडिया को इतनी दूर की कौड़ी काठमांडो स्थित पाक दूतावास ही मुहैया करा रहा है। ऐसे में प्रतिक्रियावादी नेताआें और मीडिया को समझाना आसान हो गया है कि रॉ बांग्लादेश की तरह नेपाल में स्वतंत्र तराई की बुनियाद रखना चाहता है। लेकिन पाक कूटनीतिकों को कोसने से पहले हमें इसकी समीक्षा करनी चाहिए कि नेपाल जैसे अतिसंवेदनशील और उपद्रवग्रस्त देश में रॉ प्रमुख और दूसरे भारतीय खुफिया एजेंटों को जाना चाहिए था, या नहीं? क्या इस पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता नहीं है कि कल तक जो कामरेड प्रचंड और बाबूराम भट्टराई भारत में भूमिगत होकर अपना आंदोलन चला रहे थे, उन्हीं के लोग आज भारत को विस्तारवादी क्यों कह रहे हैं? कल तक माआेवादी नेताआें के लिए कसीदे पढ़ने वाले करात, येचुरी और डीपीटी आज मौन क्यों हैं? क्यों महाकाली-पंचेश्वर जलविद्युत प्रोजेक्ट माआेवादियों को मान्य नहीं है? किसलिए माआेवादी 10 में भारत से हुई संधि की सभी ‘असमान धाराआें’ को निरस्त करना चाहते हैं? पहले एफ.एम.सी.जी. फिर आई.टी.सी. और अब कर्नाली जल विद्युत परियोजना पर काम कर रही भारतीय कंपनी जी.एम.आर. एनर्जी लिमिटेड को बंद कराने की धमकी के पीछे माआेवादी मंशा क्या है? यह भी गौर करने वाली बात है कि इस बीच चीन-पाकिस्तान की परियोजनाआें से नेपाल में छेड़-छाड़ नहीं हो रही है। क्या अप्रैल में नेपाल में आम चुनाव हो भी जाएंगे, यह सबसे बड़ा यक्ष पक्ष है। 75 में से तराई के 23 जिले भेदभाव के सवाल पर सुलग रहे हैं। जनकपुर से लेकर बीरगंज तक की चुनावी सभाआें में विस्फोट, हिंसा आने वाले दिनों में माहौल और बिगड़ने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। मधेशी जनाधिकार फोरम के नेता उपेन्द्र यादव, जनतांत्रिक तराई मुक्ित मोर्चा के जयप्रकाश गोदूत, विस्फोट सिंह, तराई मुक्ित मोर्चा के ज्वाला सिंह जैसे नेता और तराई कोबरा, मधेशी टाइगर, नेपाल डिफेंस आर्मी जैसे संगठन सात पार्टियों के साथ चुनावी सुलह करेंगे, इसे पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता।

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