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मानवता का सम्मान

प्रसिद्ध लोकोक्ित है कि ‘निज सुगंध गुण मृग नहिं जाने’ इसी प्रकार 15 वर्ष पहले पौड़ी जिले से आए सत्यवती कॉलेज के ‘पंडित जी चाय वाले’ भी अपनी तपस्या की सुगंध को स्वयं भी नहीं पहचान सके। सत्यवती कॉलेज स्टाफ के द्वारा स्वयं की एक दिन की पगार को इकट्ठा करके आनंद सिंह नेगी- पंडित जी चाय वाले के नाम से स्कॉलरशिप शुरू करने का फैसला किया है। एक गरीब आम आदमी के प्रति इससे ज्यादा मानवता क्या होगी?ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्लीड्ढr समाज के सच्चे मसीहाड्ढr पंजाब में मुल्लापुर दाखा (लुधियाना) के भाई घनैया जी ट्रस्ट और पब्लिक सेवा सोसाइटी डेरा बदोवाल के प्रमुख संत जसपाल सिंह ने 1से अब तक लगभग 17 हजार गरीब लड़कियों का विवाह करवाया है। आज किसी गरीब व्यक्ित, जिसके एक-दो लड़कियां हैं, का सारा जीवन इसी चिंता में गुजर जाता है, कि कैसे वे अपनी बेटी के लिए अच्छा वर खोजें। ऐसे में संत जसपाल सिंह जैसे लोग यदि हर प्रांत व राज्य में हों, तो एक गरीब की बेटी की शादी अच्छी तरह से हो सकेगी।ड्ढr दिव्या झा, लुधियानड्ढr कर्म से पहचान बनाएं लड़कियांड्ढr 25 जनवरी के अंक में क्षमा शर्मा का लेख हर लिहाज से विचारणीय है। आज लोग ‘सुंदरता’ और ‘कामुकता’ का अंतर ही भूल चुके हैं। इस अंतर को भुलवाने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी है। टीवी पर ऐसी कोई लड़की ही नहीं दिखी, जो ‘सैक्सी’ न हो। लड़कियां भी शायद भूल गईं कि ‘सैक्सी’ संबोधन साफ तौर पर उनके ‘भोग्या’ होने का ही प्रमाण है। हम पशु नहीं हैं कि सिर्फ ‘भोजन’ और ‘जनन’ हमारा लक्ष्य हो- हम ‘इंसान’ हैं जिसमें बुद्धि है-विवेक है-ज्ञान है-नैतिकता है-मर्यादा है-और सभ्यता है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी ही चाहिए और इसकी शुरुआत लड़कियां ही कर सकती हैं। नीली रौशनी में रैंप पर अंत:वस्त्रों में इठलाते माइक थामे ‘मदर टेरेसा’ को अपना आदर्श बताने वाली लड़कियों को एक क्षण के लिए सोचना चाहिए कि उनका कत्तर्व्य उनकी वाणी से नहीं, बल्कि उनके आचरण से झलके। ‘यौवन’ और ‘कामुकता’ हमेशा नहीं रहती-रह जाता है आपका कृतित्व।ड्ढr विनोद कुमार शुक्ला, नेहरू विहार तिमारपुर, दिल्लीड्ढr दिल्ली का बहरूपियापनड्ढr ‘पहचान पत्र पर रोष क्यों’ पढ़ा। दिल्लीवासियों का बहुरूपियापन आप समझ लें। दिल्ली में लगभग 45 प्रतिशत लोग वे हैं जो (360 गांव एक पुरानी दिल्ली) दिल्ली के इतिहास से जुड़े हैं। और अपने आपको दिल्ली के मूल निवासी कहते हैं। दूसरे 10-12 प्रतिशत वे अभागे लोग हैं, जो भारत के बंटवारे के समय अपनी जड़ों से उखाड़े गए और सरकार ने उन्हें यहां रीहैबिटेट (बसाया) किया, 30-32 प्रतिशत लोग वे हैं, जो अपनी रोजी-रोटी एवं परिवार पालन हेतु समय-समय पर दिल्ली आते रहे और जायज-नाजायज तरीके से यहां बसते चले गए (जो आज भी अपने को मूलस्थान को बता कर गर्व महसूस करते हैं)। हजारों लोग रोजाना अपने कामधंधे हेतु आते जाते हैं। दिल्ली में ऐतिहासिक धरोहरों सहित क्या सुरक्षित रहा? क्या हर क्राइम के पीछे कोई व्यक्ित और वाहन नहीं होता..? क्या रोकना-टोकना अनिवार्य नहीं..! पर राजधानी दिल्ली की चिंता क्षेत्रीय राजनीतिक गलियारों में भटक कर शर्मसार हो जाती है..? मेरा मानना है कि पहचान पत्र सामाजिक व्यक्ित को और समाजोपयोगी बनाता है और आपराधिक प्रवृत्ति पर लगाम अवश्य लगाता है। सरकार और पुलिस को कोसने वाले आखिर कब तक खैर मनाएंगे क्योंकि निर्वाचन आयोग सभी लोगों को (हर राज्य में) बहुआयामी पहचान पत्र तो उपलब्ध कराने जा ही रहा है।ड्ढr बाबू राम मास्टर, जिया सराय, नई दिल्लीड्ढr एक व दो के सिक्के में फर्क करेंड्ढr आजकल बाजार में जो नए एक रुपए और 2 रुपए के सिक्के आ रहे हैं, उनमें जरा भी अंतर नहीं है, जिससे कम पढ़े-लिखे लोगों, बुजुगरे को बहुत असुविधा हो रही है। अच्छा हो, 2 रुपए के सिक्के के किनारे काट दिए जाएं तो हर किसी को पहचानने में सुविधा होगी। जो भी नियम कानून बनें वह आम आदमी को ध्यान में रख कर बनाए जाएं, तो अच्छा रहेगा। आम आदमी को धोखा न हो इसके लिए समस्त संबंधित अधिकारी सिक्के के स्वरूप को बदलवाने का जल्द से जल्द प्रयास करें।ड्ढr शिव प्रकाश शर्मा, हापुड़ं

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