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अफसरों की नजर में इन्हें जीने का हक नहीं !

ुष्ठ उन्मूलन अभियान से संबंधित एक विज्ञापन में महानायक अभिताभ बच्चन के संदेश के उतराद्ध पर अमल करते हुए जिला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने अपने मन से कुष्ठ रोग और रोगियों के अस्तित्व को मिटा दिया है।ड्ढr ड्ढr कुष्ठ रोगियों के पुर्नवास के लिए डेढ़ दशक पहले सदर प्रखंड के भदास ग्राम में बसायी गयी कॉलोनी की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। राजेन्द्र कुष्ठ कॉलोनी में रह रहे जनक सदा बताते हैं कि वर्ष 1में जिला प्रशासन द्वारा बड़े ताम- झाम से 54 कुष्ठ पीड़ित परिवारों को शहर व गांव से दूर इस बीहड़ में बसाया था। शुरू में तो प्रशासन ने उनलोगों के सर्वागीण विकास का सब्जबाग दिखाया लेकिन समय के प्रवाह में स्वास्थ्य अधिकारियों के मन से कुष्ठ पीड़ित परिवारों की स्मृतियां भी बह गयी। कॉलोनी के ही बैद्यनाथ सदा रूआंसा होकर कहते हैं कि घर तो बाढ़ में ही ढह गया इस ठंड मेंसमय काटना दूभर हो गया है। कुष्ठ रोगियों के साथ कठिनाई यह है कि वे आग सेंक नही सकते, पेट की आग बुझाने के लिए भीख मांगते है ऐसे में पहनने के लिए गर्म कपड़े कहां से लाएं? पुलिया देवी, रजिया देवी, हरी राय, देवी सदा के हाथ-पांव कुष्ठ के कारण गल कर गिर रहे हैं । उन्हें जल्द दवा नहीं दी गयी तो वे भी लेलही देवी, पार्वती देवी व अन्हरी की तरह भगवान को प्यारे हो जाएंगे और विभागीय आंकड़ों में रोगियों की संख्या घटकर अधिकारियों की उपलब्धियां बढ़ा जाएगी। हरि राय का कहना है कि 1में यहां 54 परिवार आए थे जो बढ़कर सौ के करीब हो गए हैं। बच्चों की संख्या लगभग 60 है जो पढ़ाई से पूर्णत: वंचित है। उनके पास भीख मांगने के सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। बच्चे भी भीख मांगने को विवश हैं। न कोई पेंशन न ही बीपीएल कार्ड। उनके पास मतदाता पहचान पत्र भी नहीं कि वोट की ताकत दिखा पाएं। रजिया देवी कुष्ठ से पूर्ण पीड़ित हैं। वे कहतीं है कि दवा लेने अस्पताल गयी थी। डाक्टर बाबू तो उन्हें दवा दिए नहीं उल्टे पांच -छह टेबुल का चक्कर लगवा दिये। यह पूछने पर कि यहां कौन सी सुविधा है तपाक से जबाव मिलता है इहां टूटा खंडहर है और उहां चापाकल। इस संबंध में जिला कुष्ट अधिकारी डा. के. के. सिंह बताते हैं कि कॉलोनी के सभी मरीजों को पूर्व में एक वर्ष की निर्धारित दवा दी जा चुकी है।

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