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अध्ययन में एकेडमिक निर्भरता कम होनी चाहिए

शोध कार्यों में स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्वरूप होना चाहिए और समाजविज्ञान के अध्ययन में विश्व एकेडमिक की निर्भरता कम होनी चाहिए। समाजशास्त्र के अध्ययन में क्षेत्रीय पहचान भी बननी चाहिए। ये बातें सोमवार को आद्री एवं नीदरलैंड की संस्था सेफिस के तत्वावधान में ‘‘एकेडमिक निर्भरता’’ पर आयोजित सेमिनार में उभर कर आई। सेमिनार का उद्देश्य है कि विकासशील देश भारत,घाना,रवांडा,ब्राजील, अर्जेटीना आदि देशों से आए शोधार्थी शिक्षक इस बात पर विचार-विमर्श करें कि सामाजिक विज्ञान विषयों पर पाश्चात्य अवधारणाएं और मान्यताएं क्यों हावी हो गयी हैं? हमारे देश के शिक्षक एवं छात्र विदेश जाकर शोध करना क्यों चाहते हैं?ड्ढr ड्ढr नेशनल विश्वविद्यालय सिंगापुर के समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डा. सैयद फरीद अल्तास ने कहा कि लेखन एवं शोध के द्वारा ही एकेडमिक निर्भरता को कम किया जा सकता है। एकेडमिक निर्भरता को बदलना एक चुनौती का काम है। उन्होंने उदाहरण पेश करते हुए कहा कि किस तरह पुर्तगाल से आए लोगों ने भारतीय धर्म का नाम हिन्दू दे दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. डी. एन.झा ने कहा कि इतिहास विषय पर एकेडमिक निर्भरता कम है। लेकिन विषय की दिलचस्पी में एकेडमिक निर्भरता जरूरी है। भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद के सदस्य सचिव डा. टी.एन.सी.ए.अनंत ने कहा कि शोध के लिए वैकल्पिक मेकानिज्म विकसित करने की जरूरत है। शोध संस्थानों में समुचित फंड की भी आवश्यकता है ताकि शोध का कार्य सुचारू रूप से चल सके। पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे ने कहा कि हमारी शिक्षा एवं कूटनीतिशास्त्र भी पाश्चात्य अवधारणाओं से प्रभावित है। पाश्चात्य शोधार्थी हम पर अपना चिंतन थोप रहे हैं। सेमिनार में शैवाल गुप्ता,डा. कैथेनिका सिन्हा करखौप, प्रो. प्रभात पी.घोष ने भी अपने विचार व्यक्त किए।ं

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