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दाढ़ियों का मेला, मेले में दाढ़ी

धार्मिक मेलों में दाढ़ियों का बड़ा महत्व होता है। इलाहाबाद में इन दिनों माघ-मेला लगा हुआ है। तरह-तरह के बाबा, साधु-संन्यासी आदि दूर-दूर से पधारे हैं। उनकी तरह-तरह की दाढ़ियां हैं, किसिम-किसिम की उनकी बनावट और बुनावट है। वे अपनी दाढ़ियों से ही पहचाने जाते हैं। दाढ़ी चीज ही ऐसी है। दूर से ही पहचान में आ जाती है। जाने कितने ऐसे साहित्यकार, कलाकार और आचार्य हैं, जिन्हें उनकी पहचान नहीं मिल पाती। वे दाढ़ी रख लेते हैं। मुनियों और महात्माआें, साधुआें और संतों के लिए तो दाढ़ी लगभग एक आवश्यकता सी बन गई है। दाढ़ी और दाढ़- सरसरी तौर पर लगता है दाढ़ी, दाढ़ की स्त्रीलिंग है। लेकिन ऐसा नहीं है। दाढ़ खुद ही स्त्रीलिंग है, फिर भला उसका स्त्रीलिंग क्या होगा। वैसे भी दाढ़ी का दाढ़ से कोई सकारात्मक संबंध नहीं है। जब दाढ़ में दर्द होता है, दाढ़ी को पता भी नहीं चलता। वह उसके दर्द से पूरी तरह बे-खबर रहती है। दाढ़ों में एक दाढ़ अक्ल दाढ़ कहलाती है। वह बाद में आती है। यों तो अक्ल अमेशा भुगतने के बाद ही आती है। लेकिन दाढ़ी का अक्ल से कोई काम नहीं होता। लंबी दाढ़ी वाले मूर्ख जरूर कहलाते हैं - लंब कूचर्ो मूर्खा: भवति! दाढ़ी भले स्त्रीलिंग हो लेकिन पुरुषों के ही है, मगर पुरुषों से अधिक वह स्त्रियों को पसंद है। दाढ़ीधारी साधु-संतों के आस-पास स्त्रियों की उपस्थिति इसका प्रमाण है। भारत के नाटय़शास्त्र में न केवल दाढ़ियों का उल्लेख है, उनका बकायदा वर्गीकरण भी किया गया है। वहां क्रमश: शक्ल, श्याम, कोमल, और विचित्र ये चार प्रकार की दाढ़ियां गिनाई गई हैं। भारत ने अपने नाटय़शास्त्र में जितनी भी प्रकार की दाढ़ियों का वर्णन किया है उनका इलाहाबाद के माघ मेले में मुझे साक्षात दर्शन हुआ है। बल्कि कहना चाहिए उनके अनेक संकट-रूप भी मुझे वहां देखने को मिले। वहां मध्य आयु के साधु-संतों में ‘श्याम-शुक्ल’ दाढ़ी मिली, जिसे खिचड़ी दाढ़ी भी कहा जा सकता है। कुछ जवान साधुआें ने ‘कोमल-श्याम’ दाढ़ी रखी हुई थी। उनकी यह बेतरतीब काली दाढ़ी उनके युवा मन का प्रतीक तो थी ही, सामाजिक अव्यवथाआें से उनकी नाराजगी का इजहार भी करती थी। ‘विचित्र-शुक्ल’ दाढ़ी वाले अनेक बूढ़े संन्यासी भी दिखाई दिए। नहीं, आप ऐसा न सोचें कि मैं दाढ़ी में कोई तिनका ढूंढ रहा हूं। फिलहाल तो मेरी दाढ़ी सफाचट है। लेकिन मेले में विविध-वर्णी, विविध रूपा दािढ़यों का देखकर मेरा मन ललचा रहा है। डर है कहीं मैं भी दाढ़ीधारी न हो जाऊं।

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  • Web Title: दाढ़ियों का मेला, मेले में दाढ़ी