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परम बंधु

इस पृथ्वी पर सभी तुम्हारा विछोह सहन कर सकते हैं। जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके पिता-मां-भाई-बहनों को देखकर क्या मालूम होता है? तुम देखोगे कि वे गला फाड़ कर, अश्रु भरे नेत्रों से क्रन्दन कर रहे हैं। फिर दो-तीन दिन जाते-न-जाते ही पुन: वे स्वाभाविक हो जाते हैं, वे पुन: अपना स्वाभाविक कामकाज करना प्रारंभ कर देते हैं और कुछ दिनों बाद या कुछ माह बीत जाने पर वे जैसे उस व्यक्ित को भूल ही जाते हैं। जिन समाजों में विधवा-विवाह स्वीकृत है, वहां की विधवाएं स्वामी की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह कर लेती हैं। प्रसंगवश, भारत के हिन्दू समाज के उच्चवर्ग में विवाह को मान्यता नहीं दी गई है, किन्तु पृथ्वी के प्राय: सभी स्थानों पर यहां तक कि भारत में भी बहुत क्षेत्रों में विधवा विवाह समाज-स्वीकृत है। इसी से मैं कहता हूं कि तुम किसी आत्मीय को बंधु नहीं कह सकते हो। यहां पर कोई तुम्हारा बंधु नहीं है। भारतीय रीतिनीति के अनुसार यदि पिता-माता की केवल एक संतान रहती है तो वे अन्य किसी को दत्तक पुत्र बना सकते हैं और तब वह तुम्हारा बंधु हुआ, किंतु तुम्हारा वास्तविक बंधु कौन है? (जो तुम्हारा कभी परित्याग नहीं करता) इसके उत्तर में मैं कहूंगा जगतबंधु ही प्रकृत बंधु हैं, परमपुरुष ही तुम्हारा असली बंधु है। उन्होंने तुम्हें अतीत में प्यार किया है, भविष्य में भी तुम्हें प्यार करेंगे। वे ही केवल तुम्हारे बंधु हैं, क्योंकि वे जगतबंधु हैं। ‘बंधु’ शब्द का एक और प्रतिशब्द है ‘सुहृद’। सुहृद उसे कहेंगे, जिसके साथ कभी कोई मतविरोध न हुआ हो या होगा नहीं। किन्तु वास्तव जगत में मतविरोध तो सब समय ही सबके साथ होता रहता है। पति-पत्नी में या पिता-पुत्र में या भाई-भाई में लेकिन परमपुरुष के साथ क्या होता है? तुम जो कुछ भी करो वे उसका समर्थन करते हैं-करते रहेंगे। वे ऐसा क्यों करते हैं? करते हैं इसलिए कि वे ही तुम्हारे प्रकृत बंधु हैं। हाथ पैर से हो सकता है तुम्हारे जागतिक कामधाम को कर नहीं देते हैं यह ठीक बात है, किंतु मानस जगत में वे सब समय तुम्हें निर्देशना देते चले जा रहे हैं। हालांकि जागतिक क्षेत्र में वे प्रत्यक्ष कुछ नहीं करते। इसी से वे अच्छे मनुष्य के भी जैसे सुहृद हैं वैसे बुरे मनुष्य के भी। वे ही केवल तुम्हारी मृत्यु के बाद भी साथ में रह जाएंगे। हो सकता है मृत्यु के पश्चात तुम्हारे बंधुगण तुम्हें श्मशान तक ढोकर ले जाएंगे। संस्कार कर देने के बाद तुम्हारा शरीर जलकर राख हो जाएगी। फिर इसके बाद बंधुगण हो सकता है तुम्हारे भस्म के ऊपर जल छिड़क देंगे। तत्पश्चात नि:शब्द हो वे घर वापस आ जाएंगे। जबतक वे श्मशान घाट पर रहेंगे तब तक ही तुम्हारी वे बात सोचेंगे। तत्पश्चात सब कुछ भूल जाएंगे। किन्त ‘धर्म’ तुम्हारी मृत्यु के बाद भी संग रह जाएगा और धर्म रक्षार्थ तुमने जो जो किया है वह भी चिरस्मरणीय होकर रहेगा। इसीसे पार्थिवजगत में धर्मनिष्ठ होना होगा।ड्ढr

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