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कल्याण विभाग के साथ समन्वय बनाकर काम करेगी पुलिस

पुलिस अब कल्याण विभाग के साथ समन्वय बनाकर काम करेगी। इसके तहत रेड लाइट एरिया से पकड़ी जाने वाली लड़कियों अथवा बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए बच्चों को कल्याण विभाग की देख-रेख में पुनर्वासित किया जाएगा। इसके लिए पुलिस ने कल्याण विभाग से अधिकारी मांगे हैं। ये अधिकारी दंडाधिकारी के रूप में तैनात होंगे और खासकर पुलिस की उस टीम में शामिल होंगे जो रेड लाइट एरिया अथवा मानव तस्करी आदि के अड्डों पर छापामारी करेगी। यह जानकारी अपर पुलिस महानिदेशक (कमजोर वर्ग) ए.के. गुप्ता ने दी है।ड्ढr ड्ढr उन्होंने बताया कि अभी कल्याण विभाग के अधिकारियों की सेवा पटना, गया और मुजफ्फरपुर के लिए मांगी गई है। इन्हीं तीन जगहों पर अपराध अनुसंधान विभाग के अंतर्गत तीन एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग यूनिट (ए.एच.टी.यू.) का गठन किया गया है। पटना की इकाई एडीजी (कमजोर वर्ग) के नेतृत्व में चल रही है जबकि मुजफ्फरपुर की कमान वहां के एडीजी के हाथ में है। गया में मगध प्रक्षेत्र के डीआईजी के नेतृत्व में यह यूनिट चल रही है। श्री गुप्ता ने कहा कि यह यूनिट उन गिरोहों के खिलाफ अभियान चलाएगी जो देह व्यापार अथवा बंधुआ मजदूरी के लिए महिलाआें या बच्चों की खरीद-फरोख्त करते हैं। इसके अलावा देह व्यापार के अड्डों पर छापामारी भी की जाएगी। यहां से बरामद होने वाली महिलाआें अथवा बच्चों के लिए तत्काल पुनर्वास की व्यवस्था करनी है। लिहाजा कल्याण विभाग के अधिकारियों को इस टीम में रखा जाएगा जो पुनर्वास के लिए चलने वाली कल्याणकारी योजनाआें से पीड़ितों को जोड़ने में मदद करेंगे। कल्याण विभाग के अधिकारियों के साथ पुलिस अधिकारियों की नियमित बैठक भी कराई जाएगी। इसके अलावा महादलितों के साथ अत्याचार के मामलों में पीड़ितों को मुआवजा किस तरह मिल सकता है, इस मामले में भी पुलिस कल्याण विभाग के अधिकारियों की मदद लेगी। उन्होंने बताया कि कल्याण विभाग के प्रधान सचिव को इस संबंध में पत्र दिया गया है। उग्रवादियों से निपटने को पुलिस ने खजाना खोलाड्ढr पटना (हि.ब्यू.)। उग्रवादियों और अपराधियों पर नकेल कसने की खातिर पुलिस ने अपना खजाना खोल दिया है। बिहार में नई सरकार बनने के बाद संभवत: यह पहला मौका है जब पुलिस ने इस फंड का उपयोग अपराध के खिलाफ जारी जंग में आम लोगों को भी जोड़ने के लिए शुरू किया है। बिहार के पुलिस महानिदेशक आशीष रंजन सिन्हा के अनुसार इस राशि के उपयोग का जबरदस्त असर हुआ है और कई दुर्दात अपराधी अब सलाखों के पीछे हैं।ड्ढr दरअसल मोस्ट वांटेड अपराधियों और उग्रवादियों का सुराग पाने के लिए पुलिस मुखबिरों की भी मदद लेती है। अपराधियों और उग्रवादियों के ठिकानों की सटीक सूचना देने या पहचान करवाने के एवज में उन्हें अच्छी खासी रकम भी दी जाती है। पुलिस महकमे में इसके लिए बाकायदा बजट का प्रावधान है। इसके तहत हर वर्ष 50 लाख रुपए का बजट निर्धारित होता है जिसका उपयोग अपराधियों का सुराग देने वालों को बतौर इनाम देने में होता है। डीजीपी के अनुसार इस वित्तीय वर्ष में बिहार पुलिस ने कई अपराधियों और उग्रवादियों को दबोचने के लिए इस राशि का उपयोग किया है। इसके तहत अब तक 35 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। डीजीपी के अनुसार वर्षो से इस राशि का उपयोग नहीं हो रहा था और हर साल यह लैप्स हो जाती थी। इनाम के तौर पर आम लोगों को यह राशि दी जाती है और इससे उनका उत्साह भी बढ़ता है। उन्होंने बताया कि अपराध नियंत्रण के लिए किए गए इस प्रावधान का अब तत्परता से पालन किया जा रहा है।ं

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