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हर साल ‘नया शिक्षा मित्र’ बुनियादी उसूलों के खिलाफ

एक महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट ने हर साल नए सिरे से नए ‘शिक्षा मित्र’ की नियुक्ित को ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के बुनियादी उसूलों के खिलाफ बताया है। अदालत ने कहा है कि इससे न सिर्फ गाँवों में सबको प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने के अभियान को झटका लगता है बल्कि ‘शिक्षा मित्र’ के पद पर तैनाती के होड़ को लेकर भ्रष्टाचार के पनपने की जगह बनती है। ‘शिक्षा मित्र योजना’ की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा है कि एक बार किसी ‘शिक्षा मित्र’ की नियुक्ित होने के पश्चात जब तक कि किन्हीं वजहों से उसे पद के ‘अयोग्य’ न ठहराया जाए, उसे अगले शिक्षा सत्र के लिए पद पर बरकरार रहने का हक है।ड्ढr हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रदीपकांत तथा न्यायमूर्ति श्रीनारायण शुक्ला की लखनऊ स्थिति खंडपीठ ने यह फैसला ‘शिक्षा मित्र’ पद की दावेदार कुमारी शाहजहाँ की आेर से दायर एक विशेष अपील को खारिज करते हुए सुनाया। अपील मंे एकल न्यायाधीश के 2दिसम्बर 2007 के फैसले को चुनौती दी गई थी। अपीलकर्ता का आरोप था कि एकल न्यायाधीश ने सिर्फ इस आधार पर कि नए शिक्षा सत्र के लिए ‘शिक्षा मित्र’ की नियुक्ित बेसिक शिक्षा अधिकारी नियमानुसार करेंगे, उसकी याचिका खारिज कर दी थी।ड्ढr विशेष अपील में भी अपीलार्थी की दलील यही थी कि विपक्षी को वर्ष 2006-07 के सत्र के लिए शिक्षा मित्र नियुक्ित किया गया था। अत: वर्ष 2007-08 के नए सत्र के लिए उसे पद पर बने रहने का कोई हक नहीं था। बल्कि नए सिरे से चयन किया जाना था। अपीलार्थी की इस दलील को नकारते हुए पीठ ने कहा है कि शिक्षा मित्र योजना के लिए जारी एक जुलाई 2001 के शासनादेश के अनुसार किसी भी शिक्षा मित्र की नियुक्ित मई के अंतिम दिवस को समाप्त हो जाती है, लेकिन यदि उसका कार्य संतोषप्रद है तो समिति उसे नए सत्र के लिए बरकरार रख सकती है और यह प्रक्रिया तब तक दुरुस्त रहती है जब तक कि उस शिक्षा मित्र को ‘अयोग्य’ करार नहीं दिया जाता। एक अन्य शासनादेश 10 अक्टूबर 2005 के जरिए भी शिक्षा मित्र के नवीनीकरण की प्रक्रिया दी गई है।ड्ढr पीठ ने कहा है कि प्रदेश के हर गाँवों में सबको प्राथमिक शिक्षा देने के लिए चलाए गए सर्वशिक्षा अभियान का मतलब सिर्फ उस गाँव के शिक्षित नौजवानों को रोजगार देने का ही नहीं है बल्कि इसके पीछे असल मंशा यह है कि गाँव के पढ़े-लिखे नौजवान स्वेच्छा से गाँवों मंे सबको साक्षर बनाने के लिए आगे आएँ। पीठ ने कहा कि अगर इस योजना का मतलब यह लगाया जाए कि हर नए सत्र में नए ‘शिक्षा मित्र’ की नियुक्ित की जाए तो इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। अव्वल तो हर साल नए सिरे से नई तैनाती की प्रक्रिया में लगने वाली देर से गाँव की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ेगा। दूसरे, नियुक्त शिक्षा मित्र को असुरक्षा का भाव सताता रहेगा और अंतत: नए सिरे से नियुक्ित की होड़ में भ्रष्टाचार के फलने-फूलने की गुंजाइश बढ़ेगी। पीठ ने अंत में कहा है कि भले ही योजना में एक शिक्षा सत्र के लिए ‘शिक्षा मित्र’ की नियुक्ित का प्रावधान है पर इसका मतलब यह नहीं है कि अगले सत्र में उसका स्थान कोई दूसरा ले लेगा। यदि पूर्व में नियुक्त शिक्षा मित्र का कार्य और आचरण संतोषजनक है तो उसे अगले सत्र के लिए भी पद पर बरकरार रखा जा सकता है। लिहाजा यह ख्याल गलत है कि इस योजना मंे एक शिक्षा सत्र के लिए नियुक्त शिक्षा मित्र को अगले साल रखे जाने पर प्रतिबंध है।

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  • Web Title: हर साल ‘नया शिक्षा मित्र’ बुनियादी उसूलों के खिलाफ