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२० साल में भी नहीं सुधारी गलती

आवंटी राम प्रकाश त्रिपाठी ने एलडीए से 20 साल पहले 200 वर्ग मीटर का प्लॉट खरीदा। पूरी कीमत अदा की, कब्जा प्रमाण पत्र मिल गया, रजिस्ट्री हो गई और नक्शा भी पास करा लिया। उसके चार साल बाद उनकी जमीन से 24.5 वर्ग मीटर जमीन कम करके दूसरे आवंटी को 200 वर्ग मीटर का प्लॉट दे दिया गया। पहले आवंटी ने अपना हक माँगा तो एलडीए ने अपनी गलती मानी। कई उपाध्यक्षों और अन्य अधिकरियों ने श्री त्रिपाठी को पूरा प्लॉट देने के आदेश किए लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिल सका है।ड्ढr श्री त्रिपाठी को 28 मार्च, 1में जानकीपुरम में 200 वर्ग मीटर का प्लॉट नं.1454 आवंटित किया गया था। उसके बाद 27 जून, 1तक उन्होंने पूरी कीमत अदा कर दी, 18 नवम्बर 1ो रजिस्ट्री हो गई, 27 जनवरी 10 को कब्जा प्रमाण पत्र मिल गया और 20 मार्च 10 को नक्शा पास करवा लिया। चार वर्ष बाद उनके ठीक बगल में 200 वर्ग मीटर का प्लॉट संख्या सी-1453 विजय कुमार चड्ढा को आवंटित कर दिया और उन्हें सात फरवरी 1ो एलडीए के अभियन्त्रण विभाग ने मौके पर कब्जा दे दिया।ड्ढr श्री त्रिपाठी को यह जानकारी हुई तो उन्होंने एलडीए के अधिकारियों से न्याय दिलाने की अपील की। इंजीनियर उन्हें चक्कर लगवाते रहे। वर्ष 2000 में तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष दिवाकर त्रिपाठी ने सचिव और इंजीनियरों पूछा कि उनको पूरे प्लॉट का कब्जा ‘पजेशन लेटर’ के अनुसार क्यों नहीं दिया जा रहा? इंजीनियरिंग विभाग से रिपोर्ट माँगी गई। उसके बावजूद फाइल एक मेज से दूसरी मेज घूमती रही और रिपोर्ट दी जाती रही। इसी बीच श्री त्रिपाठी कोर्ट चले गए। कोर्ट में भी शपथ पत्र दाखिल कर एलडीए ने माना कि त्रुटिवश दूसरे आवंटी श्री चड्ढा को भूखण्ड आवंटित कर दिया गया। दूसरे स्थान पर भूखण्ड उपलब्ध कराने और दोनों आवंटियों की आपसी सहमति से 12.5 मीटर जगह कम करने की पेशकश का भी जिक्र एलडीए ने किया और कहाकि इसके लिए कोई भी आवंटी तैयार नहीं है। पिछले वर्ष फिर श्री त्रिपाठी एलडीए के अफसरों से मिले। कुछ माह पूर्व अपर सचिव एसके सिंह ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि एलडीए खुद कोर्ट में यह स्वीकार कर चुका है कि श्री चड्ढा को गलती से 200 वर्ग मीटर का कब्जा दिया गया है। ऐसे में पहले आआे पहले पाआे के आधार पर श्री त्रिपाठी को 200 वर्ग मीटर का भौतिक कब्जा दिया जाना और श्री चड्ढा को 175.5 वर्ग मीटर का कब्जा दिया जाना न्यायसंगत प्रतीत होता है। कार्रवाई करते हुए न्यायालय को अवगत कराया जा सकता है कि प्राधिकरण ने पूर्व मंे की गई त्रुटि को ठीक कर लिया है। इस पर भी कार्रवाई नहीं हुई तो फिर तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष हरभजन सिंह के समक्ष मामला पहुँचा और उन्होंने 18 अक्तूबर, 2007 को फिर अधिकारियों से पूछा कि क्यों और कैसे कब्जा नहीं दिया गया? उसके बाद से फिर उनकी फाइल दफ्तर में घूम रही है। एलडीए सचिव एस. एस. मिश्र का कहना है कि यह मामला उनकी जानकारी में तो आया है। वह इसकी पूरी पड़ताल करवाकर कार्रवाई करेंगे।

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