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बाराबंकी में बहुत से मरीजों की आँख में तो लेंस लगे ही नहीं

बाराबंकी के नेत्र शिविर में बहुत से मरीजों की आँखों में लेंस लगाया ही नहीं गया। इन मरीजों की ‘कनवेंशनल मैथेड’ से सर्जरी की गई जिसमें मरीज की आँख से लेंस निकाल दिया जाता है और उसे आजीवन चश्मा लगाना होता है। वहीं मोतियाबिंद के ऑपरेशन में ‘लेंस का खेल’ भी सामने आ रहा है।ड्ढr मोतियाबिंद की सर्जरी तीन प्रकार से होती है। पूर्व में केवल ‘कनवेंशनल मैथेड’ (एक्सट्रा कैप्स्युलर कैटरेक्ट एक्सट्रैक्शन या ईसीसीई) से सर्जरी की जाती थी। इसमें आँख से लेंस निकालकर मरीज को मोटा चश्मा लगा दिया जाता है। इसमें खर्च कम है लेकिन खतरे सबसे अधिक। एक दशक पूर्व खुर्जा में लोगों की आँख की रोशनी इसी ऑपरेशन के बाद चली गई थी। इसके बाद इस सर्जरी पर रोक लगा दी गई। बाराबंकी में ऑपरेशन कराने वाले कई मरीजों की आँख से लेंस निकाल लिया गया। कायदे से इन मरीजों की एक्सट्रा कैप्स्युलर या फेकोइमल्सीफिकेशन सर्जरी की जानी चाहिए थी। इसमें आँखों के खराब लेंस को अंदर ही तोड़कर टुकड़े में निकाल लिया जाता है। इसकी जगह आईआेएल लेंस (इंट्राआक्युलर लेंस) डाला जाता है। इसके विपरीत बाराबंकी में मरीजों को कोई लेंस लगाया ही नहीं गया। लखनऊ भेजे गए कई मरीजों की आँख की जाँच में इस बात के लक्षण जाँच अधिकारियों को मिल रहे हैं। पड़ताल हो रही है कि कितने मरीजों में ऐसा किया गया। इसी वजह से मरीजों में संक्रमण भी तेजी से हुआ और आँख की रोशनी चली गई। वहीं विभाग सरकारी अस्पतालों में चल रहे लेंस के खेल पर भी लगाम की तैयारी कर रहा है। सरकारी अस्पताल में संपन्न लोग मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाने के दौरान सरकारी लेंस नहीं डलवाते। स्वास्थ्य विभाग में जिस लेंस की आपूर्ति इस समय हो रही है उसकी थोक में कीमत महज 45 रुपए है। जबकि बाजार में 100 रुपए से लेकर 31 हजार रुपए तक के लेंस हैं। एक अफसर ने माना कि ऑपरेशन में महँगे लेंस की बजाय सरकारी लेंस ही लगा दिया जाता है। बाद में लेंस दवा की दुकानों पर वापस कर दिए जाते हैं। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. एलबी प्रसाद का कहना है कि मामले की जाँच हो रही है।

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