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कलयुगी मां ने रेलवे ट्रैक पर फेंका बच्ची को

दुनिया में बहुत से ऐसे इंसान हैं जो औलाद के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च की चक्कर लगाते हैं। गोद में नवजात की किलकारी सुनने के लिए लोग मन्नतें मांगते हैं। वहीं कुछ ऐसी भी कलयुगी मां हैं जो बच्चे को लावारिस छोड़ कर चली जाती हैं। ऐसी ही ममता को दागदार करने वाली एक बेरहम मां ने मंगलवार की शाम अपनी बिटिया को जन्म के छह घंटे के बाद ही मीठापुर गुमटी के पासरेलवे ट्रैक पर बेसहारा छोड़ कर भाग गई और थोड़ी देर के बाद ही फूल जैसी बच्ची की मौत हो गई।ड्ढr ड्ढr नौ माह तक पीड़ा सहने के बावजूद भी उस मां ने जिगर के टुकड़े को क्यों फेंक दिया यह तो शायद ऊपर वाले को ही मालूम होगा। हो सकता है कि उस मां की कोई मजबूरी रही हो। पर इतना तो जरूर है कि मां जैसा पवित्र रिश्ता बदनाम जरूर हो गया। वैसे घटनास्थल पर मौजूद भीड़ के बीच चर्चाआें का बाजार गर्म रहा। जितनी मुंह उतनी बातें। किसी ने इसे उस मां की मजबूरी करार दिया तो किसी ने बेटी होने की वजह। बहरहाल मामला जो भी हो लेकिन नवजात के शव को देखकर लोगों ने अफसोस जताया। इसी बीच पटना जंक्शन पर तैनात जीआरपी थानाध्यक्ष आलेक कुमार को किसी ने सूचना दी। पुलिस बिना देर किये अपना मानवीय चेहरा दिखते हुए मासूम का शव थाना ले आई। संस्कृत में भी बना दिया डेमोंस्ट्रेटरड्ढr पटना (हि.ब्यू.)। संस्कृत मंे डेमोंस्ट्रेटर! चारा घोटाले की तर्ज पर सूबे के विश्वविद्यालय गबन के ऐसे कई नए मुहावरे गढ़ रहे हैं। वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए मुजफ्फरपुर के बीआरए बिहार विश्वविद्यालय गई सरकारी अंकेक्षकों की टीम ने वहां की जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी है वह काफी दिलचस्प है। इस विवि के लेखा में आमद का कॉलम खाली है। सिर्फ खर्च ही खर्च दर्ज है। वहां गई अंकेक्षक टीम खुद को असहाय महसूस कर रही है। उसने सरकार से शिकायत की है कि लाखों-करोड़ों रुपए के विपत्रों की जांच वे महज इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि विवि प्रशासन उन्हें वांछित अभिलेख नहीं मुहैया करा रहा है। वहीं मानव संसाधन विकास विभाग के वरीय अधिकारी भी पसोपेश में हैं-करें तो क्या करें। उनके द्वारा विभाग से बार-बार भेजे जा रहे कड़े पत्रों की भी विश्वविद्यालयों द्वारा नोटिस नहीं ली जा रही है।ड्ढr इस विवि की गड़बड़ियों की फेहरिस्त में अंकेक्षकों ने मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज का एक मामला प्रमुखता से नोट किया है। इसमें पी कुमार को संस्कृत में डेमोंस्ट्रेटर के पद पर कार्यरत दिखाकर 5500 से 8000 के वेतनमान के हिसाब से राशि की मांग की गई है जबकि इस विषय में डेमोंस्ट्रेटर का कोई प्रावधान ही नहीं है। यही नहीं वित्तीय वर्ष 2008-0े बजट में डेमोंस्ट्रेटर के भी वेतन की मांग कर दी गई है। यहां ध्यान देने लायक है कि यह पद तीन दशक पहले ही समाप्त हो चुका है। इस पद के लिए दिखाए गए वेतनमान में भी भिन्नता पाई गई है। साथ ही वेतनमान के अधिकतम स्तर से भी बहुत अधिक राशि की मांग बजट में की गई है। वित्तीय वर्ष 2005-06 और 2006-07 के रोकड़ पुस्तों में आय का ब्योरा पंजी में अंकित नहीं है जबकि व्यय का ब्योरा भी अधूरा ही दर्ज है। अंकेक्षकों की टीम के मुताबिक रोकड़ पुस्त पंजियों का लेखापाल या अन्य किसी सक्षम पदाधिकारी ने सत्यापन नहीं किया है जिसके कारण इस पंजी को मान्यता देना संभव नहीं है। इसके अलावा विवि द्वारा कोर्ट केस के अनेक मामलों में याचिकाकर्ताओं की पेंशन एवं अन्य दावों का निपटारा तो कर दिया गया मगर उनकी निजी संचिकाओं, पेंशन पेपर और अन्य कागजात अंकेक्षकों को उपलब्ध नहीं कराये जा रहे हैं। इस कारण बकाया विपत्रों की जांच नहीं हो पा रही है। इस संबंध में अंकेक्षकों ने ब्यास नारायण सिंह, रामवृक्ष ठाकुर, कपिलदेव सिंह और जितेन्द्रनाथ एवं अन्य से संबंधित अनेक वादों का हवाला दिया है। इससे पहले भी विभागीय अधिकारियों के साथ हुई बैठक में अंकेक्षकों ने इस विवि द्वारा अभिलेख नहीं देने की शिकायत की थी।

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