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मुंबई के सियासी नतीजों पर यूपीए में चिंता

अशांति और िहसा का माहौल पैदा करने के मुख्य आरोपी राज ठाकरे की मुंबई पुलिस आयुक्त और अन्य आमंत्रित साहबों के साथ अखबारों में छपी तस्वीर ने बुधवार को यूपीए के कई शीर्ष नेताओं की खुन्नस और बढ़ा दी है। राज की सेना के उपद्रव और उस पर प्रशासन के ढुलमुल रुख को लेकर उत्तरभारतीय केंद्रीय नेताओं का बड़ा तबका पिछले दो-तीन दिन से हैरत में है। गुरुवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में भी यह मुद्दा उठ सकता है। कानून-व्यवस्था राज्य का मामला है, इसके बावजूद केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इस पर सफाई देनी पड़ सकती है कि देश की वाणिज्य-राजधानी में मुट्ठी भर लोगों की गुंडागर्दी बेरोकटोक कैसे चल रही है। जिस व्यक्ित के खिलाफ अशांति-उपद्रव पैदा करने का मामला दर्ज है, वह उसी महानगर के पुलिस प्रमुख के पारिवारिक समारोह में अपनी ‘स्टार-मौजूदगी’ कैसे दर्ज कराता है। उत्तरी भारत के कई वरिष्ठ कांग्रेसियों के मन में भी यह सवाल है। एक पूर्व कांग्रेसी-केंद्रीय मंत्री ने तो यहां तक कहा, ‘आस्ट्रेलिया में काम कर रहे बेंगलुरू के एक युवक के साथ हुए अमानुषिक व्यवहार पर प्रधानमंत्री ने आक्रोश व्यक्त क रते हुए कहा था कि उसके माता-पिता का बिलखता चेहरा देखकर उन्हें रात को नींद नहीं आई। हम सबने प्रधानमंत्री की सहृदयता की प्रशंसा की। मुंबई में निर्दोष उत्तरभारतीय कामगारों पर हो रहे हमलों पर भी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार से इसी तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा है।’ पर ठोस कार्रवाई न होते देख यूपी-बिहार के कांग्रेसी अब अपने इलाकों में मुंबई-घटनाक्रम के राजनैतिक फ लितार्थ को लेकर चिंतित हैं। रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने मंगलवार को प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर चर्चा की थी। जिन पूरबियों को राज की सेना महाराष्ट्र पर बोझ बता रही है, उसे नहीं मालूम कि बिहार में साढ़े सोलह लाख गैरबिहारी रहते हैं। आचार्य कृपलानी, मधु लिमये, अशोक मेहता, रवींद्र वर्मा, जार्ज फर्नाडीस, शरद यादव और मुफ्ती सईद जैसे बड़े नेता मातृप्रदेश न होने के बावजूद बिहार में चुनाव जीते हैं। सुचेता कृपलानी तो उप्र की मुख्यमंत्री तक बनीं। उत्तरप्रदेश मूल के बाबूलाल गौड़ अब पूरी तरह मध्यप्रदेशी हैं और मुख्यमंत्री रहे हैं।ं

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