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मकान मालिक-किराएदार झगड़ा जनहित मामला नहीं

जनहित याचिकाओं की बाढ़ और इससे न्यायिक कार्य में बाधा उत्पन्न होते देखकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी याचिकाओं के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मकान मालिक और किराएदार का झगड़ा, सेवा, पेंशन, ग्रेच्युटी संबंधी मामले, सरकारी विभागों और स्थानीय निकायों के खिलाफ शिकायत संबंधी जनहित याचिकाएँ दाखिल नहीं की जा सकेंगी, लेकिन टैक्स देने वाले लोग सरकारी विभागों के खिलाफ शिकायती पत्र संबंधित अदालत को भेज सकेंगे। ऐसे ही स्कूलों में दाखिला, बेटे से गुजारा भत्ते की माँग वगैरह पर भी शिकायती पत्र भेजना होगा और अदालत इसे चिट्ठी के जरिए दाखिल याचिका मानेगी।ड्ढr सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों कामकाज में बाधा उत्पन्न करने वाली ऐसी याचिकाओं को दाखिल करने वालों पर एक लाख रुपए जुर्माना लगाने की बात भी कही थी। अब नए दिशा-निर्देशों से शीर्ष कोर्ट में पीआईएल दाखिल करने वालों की संख्या कम हो जाएगी। दिशा-निर्देशों में पत्नी-बच्चों-माता-पिता को गुजारा भत्ता के विवाद भी जनहित याचिका की श्रेणी से बाहर हो गए हैं। इन मामलों में आपराधिक न्याय प्रक्रिया संहिता की धारा-125 के तहत संबंधित अदालत को पत्र लिखकर गुजारिश की जा सकेगी।ड्ढr अदालत ने कहा है कि बँधुआ मजदूरी, उपेक्षित बच्चों, कम से कम दिहाड़ी न देने और जेलों में उत्पीड़न व 14 साल की कैद के बाद रिहाई के मामले जनहित याचिका मानी जाएगी। रिहाई संबंधी याचिका को संबंधित हाईकोर्ट देखेगा। इनके अलावा पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज न करना, उत्पीड़न, हिरासत में मौत के अलावा महिलाओं के खिलाफ अपराध, बहू को जलाने या उसका उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या और अपहरण के मामलों में जनहित याचिका दाखिल की जाएगी। गाँव में उत्पीड़न, अनुसूचित जाति जनजाति के व्यक्ित का पुलिस द्वारा उत्पीड़न भी इसी याचिका के जरिए से कोर्ट के बताया जा सकेगा।

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