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चेतना को विशाल बनाएं

एक बार किसी ने एक साधिका से पूछा कि अपनी चेतना को विशाल कैसे बनाया जा सकता है? साधिका ने जवाब दिया- आसान तरीका है, आप अपने-आप को किसी विशाल चीज से एकात्मक कर लो। लेकिन यह उस वक्त ज्यादा कारगर होगा, जब तुम्हें लगने लगे कि तुम्हारे विचार किसी संकरे, सीमित चेतना में पूरी तरह बंद हो चुके हैं। उस अतुलनीय चेतना के बारे में सोचते हुए तुम्हें जरूर लगने लगेगा कि हमारे अंदर उस चीज की कमी हे, जिससे जीवन को परमचेतना में विलीन कर अपने परम लक्ष्य की पूर्ति की जा सकती है। चेतना को विशाल बनाने के लिए परमचेतना का अवलंबन लेना ही पड़ेगा। लेकिन प्रकृति और आकाश की विशालता से भी प्रेरणा लेकर चेतना को विशाल बनाया जा सकता है। धरती पर मौजूद हर वस्तु के साथ एकात्म होने से भी चेतना का विकास होता है। संकीर्णता वाली हर चीज से दूर रहो। उस चीज से भी दूर रहना चाहिए,जो तुम्हारी दृष्टि को संकुचित करती हो। मतलब चेतना के विकास में जिससे अंश-मात्र में भी कोई बाधा पहुंचती हो, तो उस पर तुरंत गौर करना चाहिए। जितनी जल्दी हो सके ऐसी जगह से हट जाना चाहिए। हम जितना अधिक से अधिक अपनी चेतना के बारे में विचार करेंगे, उतनी ही हमारी उन्नति होती जाएगी। चेतना के निरंतर विकास के लिए अपनी दृष्टियों, संवेदनाआें और संकल्पों पर भी विचार करना चाहिए। ये सारे कारक चेतना को महती बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इंसान की चेतना ही उसके महान व्यक्ितत्व का निर्धारण करती है। चेतना जितनी विशाल होती है, उतनी ही आत्मिक पूंजी इकट्ठी होती होती जाती है। जितनी आत्मिक पूंजी इकट्ठी होती जाती है, उतना ही मनुष्य का विकास होता जाता है। मनुष्यगत जितनी खामियां होती हैं, वे खत्म होती जाती हैं। वह प्राणी मात्र का हितुआ बन जाता है। दृष्टिकोण हमारा कितना मानवीय है, और कितना होना चाहिए यह चेतना के बेहतर होते जाने पर निर्भर करता है। चेतना के उच्चतर स्तरों पर निरंतर ऊपर की आेर उठते जाने और आत्मशक्ित को मजबूत करते जाने के लिए यदि हम स्वाभाविक ढंग से सोचने का उपक्रम करें, तो एक दिन चेतना के स्तर में विशालता का स्तर अत्यंत ऊंचा हो जाता है। दूसरी तरफ यदि संवेदनशीलता का स्तर अत्यंत कम है, तो चेतना में नीरवता आती जाती है। अध्यात्म वेत्ताआें के अनुसार चेतना अतिमन तक जाती है, लेकिन जब चेतना नीचे आकर निचले क्षेत्र की चेतना में प्रवेश पाती है, तो वह धीरे-धीरे शांत हो जाती है। फिर इसका कोई रूपान्तर नहीं होता। कैसे हम अपने मन को अतिमन की आेर ले चलें और अति मन से महत चेतना की आेर बढ़ें, इस पर निरंतर सोचते रहने की आवश्यकता होती है। खुद को आगे-आगे लगातार उच्चतम स्तर पर ले चलने की शक्ित और संकल्प करते जाएं और अंतर आलोक को बढ़ाते जाएं, यह परम चेतना के सानिध्य में पहुंचने का एक मात्र रास्ता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमारी क्रियाशीलता निरंतर बनी रहनी चाहिए।

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