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थोक में क्षमादान कानून विरुद्ध : सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति एवं रायपालों सहित कोई भी संवैधानिक प्राधिकार उसे प्राप्त क्षमादान के अधिकार का मनमर्जी से, असंवैधानिक तरीके से या राजनीतिक आशयों एवं निहित इरादों से इस्तेमाल नहीं कर सकता। मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन तथा न्यायमूर्ति आरवी रवीन्द्रन की एक पीठ ने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आंध्र प्रदेश में सजायाफ्ता कैदियों की कारावास की अवधि के बीच ही रिहाई के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी। यद्यपि पीठ ने इस रिहाई के खिलाफ पहले जारी अपना स्थगन आदेश संशोधित करते हुए कहा कि स्थगन आदेश केवल आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदियों पर लागू होगा और कम अवधि की सजाकाट रहे कैदियों की सजा की अवधि कम करने या उन्हें क्षमादान देने की प्रशासन को आजादी होगी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई मार्च के प्रथम सप्ताह में करने की घोषणा करते हुए इसमें केन्द्र सरकार को भी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया तथा कहा कि अगली सुनवाई पर केन्द्र की आेर से देश के महाधिवक्ता को मौजूद होना चाहिए। आजीवन कारावास की सजा झेल रहे कैदियों को क्षमादान पर एतराज करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी रिहाई पर तब तक विचार नहीं किया जा सकता जब तक उन्होंने 14 साल जेल में नहीं बिता लिए हों। आंध्र प्रदेश सरकार के अधिवक्ता अंध्याजरुन ने जब स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर कैदियों को माफी देने के सरकार के फैसले को उचित ठहराने की कोशिश की, तब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि जिस व्यक्ित को आजीवन कारावास की सजा दी गई हो उसे केवल छह-सात साल के बाद कैसे जेल से रिहा किया जा सकता है। न्यायमूर्ति बालाकृष्णन ने सवाल किया कि आपके नियम देश के कानून से उलट कैसे हो सकते हैं, क्या आप समझते हैं कि सरकार की समिति कानून के परे जाकर स्वतंत्र रूप से क्षमादान का फैसला कर सकती है। न्यायालय ने यह भी याद दिलाया कि देश में मृत्युदंड लगभग खत्म कर दिया गया है और हत्या के अधिकतर मामलों में आजीवन कारावास की ही सजा दी जाती है और स्पष्ट किया कि अदालत नियमों के अधीन जो भी निर्देश देती है या दिशा निर्देश जारी करती है, समिति को सिर्फ उसका अनुपालन ही करेगी।

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