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बाहर वालों पर बलिहारी होते रहे बिहारी!

जेबी कृपलानी, अशोक मेहता, मधु लिमये, जार्ज फर्नांडिस, एमएस ओबेराय, रवींद्र वर्मा, नीतीश भारद्वाज और शरद यादव ! ये नेतागण समय-समय पर बिहार से लोकसभा के चुनाव जीतते रहे। बिहार से रायसभा में पहुंचने वालों में आई के गुजराल और कपिल सिब्बल प्रमुख हैं। इनके अलावा भी ऐसे लोग हैं, जिन्हें बिहार ने गले लगाया है। जिस बिहार ने इन ‘पर-प्रांतियों’ को बिहार से संसद में पहुंचाने में भी कभी ऐतराज नहीं किया, उसके लोगों को पिछले कुछ साल से असम, पंजाब और महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमाने में भी दिक्कत हो रही है। करीब आठ करोड़ की जनसंख्या वाले बिहार में करीब 16 लाख गैर-बिहारी अब भी शांतिपूर्वक निवास कर रहे हैं और अपनी जीविका चला रहे हैं। बिहार पहले बंगाल का ही हिस्सा था। बंगालियों के करीब करीब हर क्षेत्र में वर्चस्व को देखते हुए बिहारियों ने अभियान चला कर 1में अलग प्रदेश बनवाया। इसके बावजूद बंगालियों को किसी ने निकाल बाहर नहीं किया। जानकार लोग बताते हैं कि बंगाल से बिहार के अलग होने के समय कुछ मानसिक तनाव जरूर था, पर जो बंगाली लोग बिहार से गए, वे अपनी मर्जी से। जो रह गए, उन्हें उनकी योग्यता व पेशे के अनुकूल बिहारियों के समकक्ष व कुछ मामलों में कुछ अधिक ही सम्मान मिलता रहा है। राय के विभाजन के काफी समय बाद तक भी बिहार में शिक्षा, वकालत और चिकित्सा के क्षेत्रों में बंगालियों का दबदबा रहा। राजनीतिक क्षेत्र में तो गैर बिहारियों को जगह देने में बिहार ने आजादी के बाद से ही न सिर्फ उदारता दिखाई,बल्कि रिकार्ड ही कायम कर दिया। ऐसी उदारता संभवत: देश के किसी अन्य प्रदेश ने पर-प्रािंतयों के लिए शायद नहीं दिखाई। देशभर के योग्य नेतागण बिहार से सांसद बनें और इस गरीब बिहार की गरीबी मिटाने की चिंता करें, ऐसी उम्मीद बिहारवासियों ने जरूर की थी, पर यह उम्मीद आंशिक रूप से ही पूरी हो सकी है। यदि आजादी के साठ साल बाद भी आज बिहार के लाखों लोग रोजी-रोटी के लिए अन्य प्रदेशों में जाने को बाध्य हैं, तो इसके लिए वे पर-प्रांती भी यहां जिम्मेदार माने जा रहे हैं, जिन्होंने अपना राजनीतिक चारागाह तो बिहार को बनाया, पर इस प्रदेश को बीमारू प्रदेश की श्रेणी से निकालने की काफी कम कोशिश की। हालांकि इसको लेकर कभी इन सांसदों को कोई उलाहना नहीं सुनना पड़ा। पचास के दशक में जब जेबी कृपलानी और अशोक मेहता बिहार से लोकसभा के सदस्य चुने गए थे, तब समस्याएं भी ऐसी नहीं थीं, जिससे कोई क्षेत्रवाद की फसल बोए और काटे। समय बीतने के साथ साथ देश का असमान विकास होने लगा और इसके कुपरिणाम भी सामने आने लगे। साठ के दशक में जब महाराष्ट्र के मूल निवासी मधु लिमये बिहार से सांसद बने तो राय की स्थिति के अध्ययन के बाद वे यह कहते रहे कि बिहार इस देश का ‘आंतरिक उपनिवेश’ बन कर रह गया है, यानी बिहार के साधनों से देश के बड़े बड़े शहर चमकाए जा रहे हैं। वहां उद्योग फल-फूल रहे हैं, पर बिहार गरीब बना रहा। इस बयान व चिंता के बाद भी हुआ क्या? बस बिहार का शोषण एक नारा भर बन कर रह गया। बिहार के साथ एक बार पहले बेइंसाफी हुई जब इसे विकसित नहीं होने दिया गया। अब एक बार फिर बेइंसाफी हो रही है, जब देश के विभिन्न रायों में रोजी-रोटी की तलाश में पहुँचे बिहारियों के साथ जहां-तहां और यदाकदा अमानवीय व्यवहार हो रहा है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है। इसकी यह कह कर अनदेखी नहीं की जा सकती कि वहां राज ठाकरे अपनी राजनीति चमकाने के लिए अतिवादिता पर उतर आए हैं। उदाहरण और भी हैं। देश की अर्थव्यवस्था के जानकार लोग बताते हैं कि प्रथम पंचवर्षीय योजना अवधि से ही बिहार को समुचित आर्थिक मदद केंद्र से नहीं मिली। कुछ अन्य रायों के अनुपात में तो काफी कम मदद मिली। 2000 तक खनिजबहुल झारखंड बिहार का ही अंग था। खनिजों का अन्य रायों के फायदे के लिए किस तरह दोहन किया गया, उसका जीता-जागता प्रमाण रेल-भाड़ा समानीकरण कानून था। यह आजादी के बाद लागू हुआ, जो नब्बे के दशक तक लागू रहा। नियम यह था कि बिहार की खानों से जो खनिज पदार्थ निकाले जाएंगे, उन्हें धनबाद से पटना पहुंचाने के लिए जितना रेल-भाड़ा लगेगा, उतना ही रेल-भाड़ा धनबाद से मुंबई पहुंचाने में लगेगा। जब भाड़ा उतना ही लगना है, तो उद्योगपति बिहार में कारखाना क्यों लगाएगा? मुंबई, चेन्नई या कोलकाता में क्यों नहीं लगाएगा? यही हुआ भी। बिहार के कोयले से पैदा की गई बिजली मुंबई को तो रौशन करती रही, पर बिहार में चिराग तले अंधेरा रहा। मधु लिमये बिहार के बारे में सोचते थे क्योंकि वे देश के बारे में सोचते थे। मधु लिमये को कभी बिहारवासियों ने बोझ नहीं माना। वे चार बार बिहार से लोकसभा के लिए चुने गए थे। ऐसे चुनाव क्षेत्र से वे जीते जहां ब्राह्मणों के मत कतई निर्णायक नहीं थे। यह भी सच है कि बिहार के पिछड़ेपन के लिए बिहार के अनेक नेतागण भी जिम्मेदार रहे हैं। पर न जाने क्यों, बिहार के साथ सौतेला व्यवहार करने का केंद्र सरकार पर भी अक्सर आरोप लगता रहा है। यह आरोप कांग्रेस के भी कुछ नेता भी लगाते रहे हैं। नीतीश सरकार ने भी अब यह आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि केंद्र सरकार बिहार के विकास के लिए उचित आर्थिक मदद नहीं कर रही है। हालांकि अपने शासन काल के प्रारंभिक महीनों में नीतीश सरकार को केंद्र से ऐसी कोई शिकायत नहीं थी। राजग का आरोप है कि बिहार में हो रहे विकास कार्यो के कारण कुछ राजनीतिक ताकतें अब ईष्र्यालु हो गई हैं और वे ताकतें बिहार को मिलने वाली केंद्रीय मदद में बाधा पहुंचा रही हैं। उधर, बिहार से कुछ केंद्रीय मंत्री यह कह रहे हैं कि बिहार सरकार केंद्र के पैसों का सदुपयोग ही नहीं कर पा रही हैं।ड्ढr इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच बिहार के विकास में एक बार फिर बाधा उपस्थित हो सकती है। इससे गरीबी बढ़ेगी, क्योंकि बढ़ती आबादी के अनुपात में संसाधन नहीं बढ़ रहे हैं। नतीजतन रोजी-रोटी की तलाश में अधिक लोग दूसरे प्रदेशों में जाएंगे ही। यदि अन्य प्रांतों से उन्हें दुत्कार कर भगाया जाएगा, तो लौटकर उनमें से अनेक लोगों के नक्सलियों की शरण में जाने से कोई रोक नहीं सकता। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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