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पाकिस्तानी समाज की डरावनी सच्चाई

हमें आजादी मिलते ही हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का ही बंटवारा नहीं हुआ था। हमने जमीन और लोगों को बांटने के साथ-साथ अपनी भाषाआें का भी बंटवारा कर लिया था। हिन्दुस्तान ने हिन्दी को अपनी राष्ट्रभाषा बनाने का ऐलान कर दिया। पाकिस्तान ने वह दर्जा उर्दू को दे दिया। लेकिन हम हिन्दी को सब लोगों की भाषा नहीं बना पाए। अपनी और भाषाएं मसलन उड़िया, बंगाली, असमिया, गुजराती, मराठी, तेलुगु, तमिल, मलयालम, कश्मीरी और पंजाबी ने अपना अलग झंडा बुलंद किए रखा। हिन्दी कुल मिला कर हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार में सिमटी रही। पाकिस्तान ने अपनी क्षेत्रीय भाषाआें मसलन, पंजाबी, पश्तो बलूची और सिंधी को दूसरे दर्जे की बना कर रख दिया। उर्दू खास भाषा बनी रही। यह अजीब बात है। पाकिस्तान में लोग अपनी क्षेत्रीय भाषाआें में बात करते रहेंगे, लेकिन जैसे ही माइक उनके आगे लगा दो, वे उर्दू बोलने लगेंगे। या फिर उन्हें लिखने को कह दो, वे उर्दू में ही लिखने लगेंगे। बांग्लादेश बनने के बाद यह जरूर हुआ कि उन्होंने उर्दू को छोड़ दिया और बंगाली बोलने-लिखने लगे। अंग्रेजी का दर्जा एक अहम मसला था। हिन्दुस्तान में अंग्रेजी ने जोड़ने वाली भाषा का काम किया। अंग्रेजी के अखबार, पत्रिकाएं और प्रकाशक खूब फले-फूले। पाकिस्तान में उर्दू ने अंग्रेजी को पीछे छोड़ दिया। वहां चंद ही अंग्रेजी के अखबार निकले। वह भी बहुत ज्यादा नहीं बिकते थे। ज्यादातर उर्दू अखबारों और रिसालों का ही बोलबाला था। एक ही बड़ा अंग्रेजी का प्रकाशन था। कराची का ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस। बाकी सब छोटे-मोटे थे। शायद यही वजह थी कि वहां जो भी अंग्रेजी मंे लिखता था, उसे अमेरिकी या इंग्लैंड के प्रकाशकों की आेर ताकना पड़ता था। उनकी तीसरी जगह हिन्दुस्तान होती थी। दरअसल, उन्हें हिन्दुस्तान में ज्यादा पाठक मिलते थे, बनिस्बत पाकिस्तान के। हाल की मिसाल बाप्सी सिधवा, तहमीना दुर्रानी और मोहसिन हामिद के हैं। हाल ही में मैंने रक्षंदा जलील की हारपर कॉलिंस से आई ‘नाइदर नाइट नॉर डे : 13 शॉर्ट स्टोरीज बाई वीमेन राइटर्स फ्रॉम पाकिस्तान’ देखी। उन कहानियों में ज्यादातर उर्दू से थीं। कुछ ही अंग्रेजी की थीं। कुछ कहानियों में मुसलमान औरतों की दुश्वारियां थीं। पाकिस्तान के कठमुल्ला समाज में उनके हालात बयान करती कहानियां। ये कहानियां निहायत सीधे ढंग से अपनी बात कहती हैं और आपको डराती हैं। एक औरत को लटकाने के लिए जुलूस में ले जाया जा रहा है। एक औरत के दोनों स्तन सजा के तौर पर काटे जाने हैं। 12 साल की एक दुल्हन को इसलिए मार डाला गया कि वह लड़कों के साथ खेल रही थी। सबसे बड़ी कहानी तो एक लड़की की है। वह पाकिस्तान के कठमुल्ला माहौल से घबरा कर लंदन चली जाती है। वहां ब्रिटिश नागरिकता ले लेती है। लेकिन वहां पर अपने पाकिस्तानियों को नहीं छोड़ पाती। अपने ब्रिटिश बॉयफ्रेंड के साथ रहने के बावजूद उनसे बतियाने, बिरयानी और आम खाने से वह खुद को रोक नहीं पाती। जामिया मिलिया इस्लामिया में मीडिया और कल्चर कोऑर्डिनेटर हैं रक्षंदा जलील। वह कई उर्दू किताबों का अंग्रेजी में तर्जुमा कर चुकी हैं। दिल्ली की ऐतिहासिक जगहों पर उनकी किताब आने वाली है। उन्होंने बेहतरीन कहानियां चुनी हैं। लेकिन एक ही गड़बड़ी मुझे लगी। ये कहानियां लेखकों के वर्णक्रम के मुताबिक हैं। मेरा मानना है कि बेहतरीन कहानी पहले होनी चाहिए क्योंकि वही सबसे पहले पढ़ी जाती है। अनुवाद एक भाषा से अनुवाद करने के कुछ सीधे-सादे फॉमरूले हैं। कहानी और कविता के अनुवाद में खासा फर्क होता है। कहानी और लेखों वगैरह का अनुवाद आसान होता है। कविता का थोड़ा मुश्किल। उसमें छंद-लय वगैरह का खयाल रखना पड़ता है। किसी महान रचना का अनुवाद करते हुए तो अनुवादक को और ज्यादा सोचना पड़ता है। मुझे लगता है कि उसे तभी हाथ डालना चाहिए, जब भरोसा हो कि पहले वालों से वह बेहतर होगा। इन्हीं सब बातों को मद्देनजर रखते हुए मैंने कुलदीप सलिल के किए गालिब के अनुवादों को देखा। हाल ही में राजपाल से उनकी किताब आई है, ‘दीवान-ए-गालिब (ए सलेक्शन) गजल्स विद ऑरिजिनल टेक्स्ट एंड देयर इंग्लिश ट्रांसलेशन।’ सलिल ने एक पेज पर तो देवनागरी और रोमन में ग़ाल दी है। दूसरे पेज पर अंग्रेजी अनुवाद है। उसे पढ़ने के बाद मैं दावे से कह सकता हूं कि उनका अनुवाद बेहतरीन है। किसी फिरंगी या हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी ने इतना बेहतर अनुवाद नहीं किया है।

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  • Web Title: पाकिस्तानी समाज की डरावनी सच्चाई