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वसंत पंचमी और सरस्वती

बचपन में वसंत पंचमी कुछ परेशानी ले कर आती थी। दरअसल, स्कूल की छुट्टी नहीं होती थी और कुछ दोस्त सरस्वती पूजा के लिए जोर देते थे। हालांकि स्कूल में भी वह मनाई जाती थी। वहां वसंती कपड़ों में निराला की सरस्वती वंदना होती थी, लेकिन दोस्तों के बीच वसंत पंचमी मनाने की बात ही कुछ और थी। लेकिन वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा! हमारे अपने वेलेंटाइन किस्म के दिन भी हमें सरस्वती क्यों याद आती है? आखिर वसंत तो ऋतुआें का राजा है। अल्हड़ और मस्त। भीतर-बाहर से रंग देने वाला त्योहार। रंग ही रंग हैं वसंत में। ये सारी चीजें हमें किसी प्रकृति या प्रेम त्योहार के आसपास ले जाती हैं। बकौल आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, ‘ज्योतिषी के लिए यह धरती की मध्य रेखा के सूर्य के ठीक-ठीक सामने पहुंच जाने के आसपास का समय है।’ जाहिर है तब प्रकृति को कुछ तो होना ही है। सूर्य और धरती का मिलन। पुरुष और प्रकृति का मिलन। इसीलिए धरती इतना साज-सिंगार करती दिखलाई पड़ती है। यह सब तो ठीक है। लेकिन सरस्वती पूजा? निराला याद आते हैं। अपनी वीणावादिनी से आखिर निराला क्या वर मांग रहे हैं, ‘नव गति, नव लय, ताल छंद नव..’ यानी हे मां, हर चीज नई दे।ोिन्दगी को नया-नया सा कर दे। वह भी गति, लय, ताल और छंद सभी में। क्या वसंत नया करने वाला त्योहार नहीं है? यही नयापन नहीं है, जो उसे ऋतुआें का राजा बनाता है। उसे अल्हड़ और मस्त बनाता है। उल्लास से भरता है। आनंद देता है। एक अलग मायने में हजारीप्रसाद जी ने पुनर्नवा का जिक्र किया है। पेड़ नया नहीं होता। उसके पत्ते नए होते हैं। इसी तरह हम नए नहीं होते। हमारीोिन्दगी में कुछ न कुछ नया होता रहता है। हमें अपनीोिन्दगी में उस नएपन का स्वागत करना होता है। उसके बिनाोिन्दगी चल नहीं सकती। आप नए के आगे अड़ कर खड़े हो जाएंगे तो वह रुक जाएगी। यहोिन्दगी तो बहता पानी है। अब अगर पानी रुक जाए, तो क्या होगा? फिर प्रेम का त्योहार भी है वह। प्यार से ज्यादा नयापन किसमें होता है? वह तो हर पल नया लगता है। उसी मानवीय प्यार की ऊंचाई आध्यात्मिक प्रेम है। अपने उससे लौ लगाना है। उस शाश्वत से एक हो जाना है। इसीलिए अपने यहां वसंत पंचमी को त्योहार माना गया। अगर वसंत को हम सेलिब्रेट नहीं करेंगे, तो किसे करेंगे! सरस्वती की पूजा शायद हम इसलिए करते हैं कि हे मां, उस नएपन को हम ठीक से वरण कर सकें। इतनी शक्ित हमें देना। वह नयापन अपनी पूरी गति, ताल, छंद और लय में हमारे साथ जुड़ सके। इसकी कामना हम कर सकें। यह नयापन हमें ज्ञान की नई राहों पर ले जाए। हमें भटकाए नहीं। यानी उस नएपन को हम पूरे ज्ञान और विवेक के साथ अपनाएं। सरस्वती ज्ञान की ही नहीं, विवेक की भी देवी हैं। ज्ञान के साथ विवेक भी जरूरी है। इसीलिए हमें अपनीोिन्दगी में सही नएपन के साथ जीना होता है। सोमवार को माघ शुक्ल पंचमी यानी वसंत पंचमी है। जरा नएपन से मनाइए तो..।

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