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हम अखबार क्यों पढ़ते हैं

हम अखबार केवल सूचना-समाचार के लिए पढ़ते हैं, जो रेडियो-टीवी से 24 घंटे मिलते रहते हैं, या फिर सम्पादकीय और अच्छे-अच्छे आलेखों के लिए? अच्छे सम्पादकीय समाज से सरोकार रखने वाले संवेदनशील विषयों का सही विश्लेषण पाठकों के सामने रखते हैं और सामाजिक विषयों पर अच्छे आलेख पाठकों को प्रभावित करते हैं और प्रेरणा देते हैं, उन्हें अधिकारों और उत्तरदायित्वों की हतत्वता बताते हैं और सही राह दिखाते हैं। मानें तो एक अच्छा अखबार जनता की अंतरआत्मा बन जाता है। शायद यही कारण है कि पाठकों के हाथ में पहुंच कर केवल घंटा-दो घंटा ‘जीवित’ रहने वाला ‘अखबार’ पिछले करीब 400 साल से किसी न किसी रूप में - पहले पहल हस्त-लिखित पैम्फलेट के रूप में और बाद में प्रिंट माध्यम के द्वारा- जनता का मार्ग दर्शक बना आ रहा है। मगर लगता है अब यह ‘अखबार’ भी बाजार की भेंट चढ़ जाएगा। शेवंती नैनन ने ‘प्रेस की आजादी का एक अशोभनीय सच’ (27 जनवरी) में जिन बातों का खुलासा किया है उससे लगता है कि आहिस्ता-आहिस्ता खबरें और सम्पादकीय बिकाऊ हो जाएंगे, आलेख वही लिखे जाएंगे जो पैसा खर्च करने वाले लिखवाएंगे। पत्रकार बिक जाएगा और पत्रकारिता पूर्ण दुकानदारी बन जाएगी। किसी का एक शेर याद आ गया :ड्ढr वक्त के बाजार में हर चीज के लगते हैं दाम,ड्ढr इन दिनों यह है जहां मेंोिन्दगी का निााम,ड्ढr ए गमे दौरां तुझे मेरा सलाम!ड्ढr डॉ. आर. के. मल्होत्रा,17नीलगिरी अपार्टमेंट, अलकनंदा, नई दिल्ली शेयर बाजार और विद्यार्थी अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों का जिज्ञासु मस्तिष्क शेयर बाजार की उथल-पुथल में बहुत रुचि ले रहा है। शेयर बाजार में जब भी भूकंप आता है, समाचार पत्र इस संबंध में काफी जानकारियां देते हैं और विद्यार्थी इन्हें पढ़ते भी हैं और अपने अध्यापकों से इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने में रुचि रखते हैं। मेरा अनुभव यह है कि विद्यार्थी समाचार पत्रों की शेयर बाजार की भाषा ठीक ढंग से नहीं समझ पाते क्योंकि शेयर बाजार के सिद्धांतों का एवं व्यवहार का सीनियर सेकण्डरी कक्षाआें के अर्थशास्त्र विषय में कोई अध्याय नहीं है। इधर के वषरे में इस विषय में बजट, बैंक, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी विनिमय दर जैसे अध्याय जोड़कर अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान दिया गया है। अगर केंद्रीय शिक्षा बोर्ड और राज्यों के शिक्षा बोर्ड इनके पाठय़क्रम में शेयर बाजार का अध्याय जुड़े, तो अर्थशास्त्र विद्यार्थियों के लिए और प्रिय विषय हो जाएगा।ड्ढr नवीन चंद्र तिवारी, रोहिणी, दिल्ली वैलेन्टाइन डे का फंडा भारत में आठ-दस वर्ष पूर्व तक किसी ने वैलेन्टाइन डे के बारे में सुना नहीं था। लेकिन आजकल यह युवाओं के लिए दीवाली, होली जैसा महत्वपूर्ण हो गया है। आज के नौजवान स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस से ज्यादा वैलेन्टाइन दिवस के बारे में जानते हैं। देश में फरवरी के आसपास ‘वसंत ऋतु’ का आगमन होता है जिसे ‘रोमांस’ की ऋतु भी कहा जाता है। इस प्राकृतिक उपहार को लोग अपने-अपने तरीके से महसूस करते हैं। ‘वैलेन्टाइन दिवस’ प्रदर्शित करता है कि प्रेम प्राकृतिक भावना है। इसे शालीनता से मनाना चाहिए तभी इसकी सुखद अनुभूति बरकरार रहेगी।ड्ढr बलदेव सिंह ‘गुजराल’, केशव पुरम, दिल्लीं

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