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घूसखोरों सबक लो!

ये खबर पढ़कर तबियत का सेंसेक्स एकदम सातवें आसमान पर पहुंच गया कि बांग्लादेश की सरकारी गैस कंपनी में काम करने वाले एक महानुभाव ने घूसखोरी के नए आयाम स्थापित कर करीब साढ़े चौदह करोड़ डालर की ऊपरी कमाई कर डाली। इस ‘बंग्लादेशी रत्न’ से बिहार के उन घूसखोरों को सबक लेने जरूरत है, जो अब भी अपनी हैसियत हजार- पांच सौ रुपये से ज्यादा नहीं बढ़ा पाए हैं। लानत है। कहां करोड़ों डालर और कहां पांच सौ रूपये। गनीमत है कि ‘बंग्लादेशी रत्न’ की ये कमाई डालर में बताई गई है, कहीं इसे रुपयों में कन्वर्ट कर दिया जाए तो शायद कई रिश्वतखोरों को उस जगह दौरा पड़ जाए, जहां आम आदमी के दिल पाया जाता है।ड्ढr ड्ढr हमारे निगरानी विभाग के लिए भी यह विचारणीय विषय है। वह भी टाइम निकालकर उस ‘बंग्लादेशी रत्न’ से ईष्र्या कर सकता है। काश, निगरानी वहां होती या वह यहां होता। मगर ऐसा कुछ न हुआ। जिसे कमाना था, उसने कमा लिया और जिसे हाथ मलना था, वह एटलस में बंग्लादेश का नक्शा देखता रहा।ड्ढr ड्ढr भारत और बंग्लादेश के बीच इस तरह के मामलों में कोई संधि नहीं है। इसलिए घूसखोरी तकनीक या उसके विशेषज्ञों के आदान- प्रदान का प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन, अब मुझे लगता है कि इस तरह के मामलों में भी संधि या समझौता हो जाना चाहिए। अभी एक मामले में छोटे देश से चोट खाई है, कल कोई रंगदारी, हत्या- बलात्कार, लूट या मारपीट में हमें नीचा दिखा सकता है।ड्ढr ड्ढr पता नहीं ये बात कब समझ में आएगी कि छोटों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जैसे मेरे पड़ोसी ने चाट खाकर पत्ते चाटने की आदत अपने पुत्र से सीखी है। हम भारतीयों में एक बुरी आदत ये भी है कि हमें अमेरिका या अन्य समृद्ध यूरोपीय देशों के अलावा और कोई टीचर दिखता ही नहीं है। इस समय प्रदेश में चौतरफा विकास चल रहा है। मुख्यमंत्री से लेकर उनका पूरा अमला तक दिन- रात इसी चिंता में है कि किसी तरह अगले चुनाव के पहले प्रदेश का विकास हो जाए। लेकिन अफसोस कि कुछ अधिकारियों और कर्मचारियांे को इसकी चिंता नहीं है। वे न खुद की प्रगति चाहते हैं और न सूबे की। हर क्षेत्र में विकास की बयार बहती दिख रही है। सेंसेक्स पहले कभी- कभी ही उछला करता था, इधर उसके जैसे स्प्रिंग लग गई हो। किसी दिन स्थिर रहता ही नहीं। प्रति व्यक्ित आय बढ़ी है लेकिन घूसखोरी सेक्टर में कोई खास फर्क नहीं आया। ऊपरी आमदनी के आज भी वही पुराने- दकियानूसी तरीकों से काम चलाया जा रहा है। धिक्कार है।ड्ढr ड्ढr बताते चलें कि आज भी सूबे के सरकारी महकमों में भी ‘घूस’ को वही स्थान प्राप्त है, जो ईसा से आठ सौ अस्सी वर्ष पूर्व प्राप्त था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब निगरानी विभाग नहीं होता था। इस प्रकार देखा जाए तो भारत की इस ऐतिहासिक और नैसर्गिक कला का उत्तरोत्तर ह्रास ही हो रहा है। और, आज हालत ये है कि एक बंग्लादेशी ने रिश्वतखोरी में हमसे बाजी मार ली। निश्चित रूप से ये मामला देश की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ है, इसलिए सरकार को ध्यान देना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि इस प्रकार की कुछ और खबरें संज्ञान में आने के बाद अपने स्वदेशी घूसखोर कुंठित हो जाएं। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से विकास प्रभावित होगा।

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