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मुंबई : मार्केट शेयर की तलाश में राजनेता

उद्योगजगत की ही तरह लोकतांत्रिक राजनीति का मतलब भी इन दिनों कूटनीतिक दाँव-पेंचों से प्रतिस्पर्धियों को दरकिनार करते हुए (वोट) मार्केट का सबसे बड़ा हिस्सा खुद हथिया लेना है। इसका एक आजमूदा नुस्खा यह है कि उपभोक्ताआें की अधूरी हसरतों के चन्द इलाकों को पहचान कर उनमें प्रतिस्पर्धियों से पहले अपनी सच्चे हितैषी वाली छवि की पैठ बना ली जाए। इस नुस्खे का जन्म आज से आधी सदी पहले भारत में हुआ, जब (1में) द्विभाषी बंबई ने मराठी भाषा को अपनी सच्ची पहचान बताते हुए (मोरारजी की कड़ाई से बिदक कर) मराठी पहचान की शपथ खाई और लोग आमची मुंबईवाद के पक्ष में लामबंद होने लगे। फ्लोरा फाउंटेन से उठी उपराष्ट्रीयता की सुनामी ने उस सार्वदेशिक कास्मोपोलिटन बंबई को, जहाँ से 1में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई थी, और जो भारत की जाति-धर्म तथा प्रादेशिक संकीर्णताआें से तब तक कतई मुक्त थी (इतनी मुक्त, कि पुनर्गठन आयोग ने मराठी भाषी प्रांत की सिफारिश तक नहीं की और नेहरू ने उसे केंद्रशासित राज्य का दर्जा देने का प्रस्ताव रखा) ग्रस लिया। नतीजतन संयुक्त महाराष्ट्र समिति पैदा हुई, जिसने मुंबई को मराठी भाषी महाराष्ट्र की राजधानी बनाया। उस वक्त मतदाता-मार्केट का बड़ा शेयर हथियाने के इच्छुक अनेक दलों के नेता (डाँगे, मिरजकर, एस.एन.जोशी और फर्नाडिस) जनता के बीच बंबई का राष्ट्रीय स्वरूप रेखांकित करने की बजाए उस महाराष्ट्रवादी बैण्ड-वैगन पर लपक कर सवार हो गए, जो तेजी से चुनावी जीत की तरफ बढ़ती दिख रही थी। इस सुविधावादी रुख को पत्रकारीय धरातल पर वी.के.अत्रे जैसे पत्रकार भी सान देने तत्पर थे। लिहाजा 10 में महाराष्ट्र प्रांत बन गया। पर ऐसी फूटपरस्त उपराष्ट्रीयता के शेर की सवारी राजनैतिक दलों के लिए अंतत: घातक प्रमाणित होती है। दो बरस बाद गोआ मुक्त हुआ तो मराठी उपराष्ट्रीयता का शेर गरजा ‘गोआ-बेलगाम भी मुझे दो’। गर्जना के सुर को तीखा करते हुए वी.के.अत्रे के अधिक रैडिकल संस्करण के रूप में काटरूनिस्ट-नेता बाल ठाकरे का उदय हुआ और देखते-देखते शिवसेना तैयार हो गई जिसने गैर-मराठियों को बाहर भगाने का हिंसक कार्यक्रम लागू कर दिया। और कृष्ण मेनन बेचारे, जो जुमा-जुमा पाँच बरस पहले गोआ-विजय के हीरो थे, इस मराठावादी प्रांत में 1ा चुनाव हार गए। कल के आक्रामक क्षेत्रीय नेता को एक और अधिक आक्रामक नेता द्वारा अपदस्थ करने वाली पटकथा अब 2008 में एक बार फिर अपने को दोहरा रही है। 1ी बंबई आज मुंबई है जहाँ बाल ठाकरे के कण्ठ में बुढ़ापे का घुंघरू बजता देख नए नेता पर तौलने लगे हैं। पुत्र उद्धव की दूकानदारी चूंकि अभी उतनी पनप नहीं सकी है, लिहाजा महत्वाकांक्षी भतीजे राज ठाकरे मुंबई में ‘बाहरिया’ हिन्दी भाषी लोगों के खून की प्यासी अपनी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एम.एन.एस.) के साथ सड़कों पर आ गए हैं। राज ठाकरे की दिक्कत यह है, कि चाचा का दामन छोड़कर अपनी दूकान अलग जमाते हुए उन्होंने चाचा के गाहक तोड़ने तथा नए गाहक खींचने को म.न.पा. की चौकीदारी करने, बिल्डरों से बाहरी मुंबई तथा ‘सेज’ के लिए भूमि अधिग्रहण से महाराष्ट्र किसानों को बचाने सम्बन्धी जो कई वादे किए थे, उन्हें पूरा कर पाना उन्हें असंभव दिखाई देने लगा है। ध्यान बँटाने को उन्हें एक शानदार क्षेत्रीयतावादी मुद्दा चाहिए था, जो कि हिन्दी पट्टी के प्रवासियों में उन्हें दिखाई दिया। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गठन से पहले जब राज ठाकरे शिवसेना में ही थे (किंतु उद्धव से उनकी बोलचाल बंद हो चुकी थी) राज के अनुयायियों ने रेलवे भर्ती को आए बिहारी छात्रों पर हमला करके उद्धव की ‘मी मुंबईकार’ योजना को खम ठोंक ढंग से चुनौती दी थी। पर इसके बाद चूंकि विधानसभा चुनावों में उत्तर भारतीयों ने कांग्रेस-नेकांपा को जिताकर भाजपा-सेना को हरा दिया तो राज को, जो अब तक अपनी अलग पार्टी बना कर नगर महापालिका चुनावों में जगह बना चुके हैं, लगने लगा, कि ‘सॉफ्ट शिवसेनत्व’ की बजाए पुराने धारदार उपराष्ट्रीयतावादी तेवर दोबारा अपनाना शायद अधिक अवसरानुकूल रहेगा। और ऐसा कड़ा अलगाववादी तेवर उन्हें बाल ठाकरे और उद्धव की वर्तमान् शिवसेना से अलग स्पष्ट छवि भी दे सकता है, जो इन दिनों ग्रामीण बेरोजगारी, किसानों के लिए ऋण माफी और जल-संकट जैसे रचनात्मक (किंतु गैर-भड़काऊ, नर्मदिल) मुद्दों को तमाम मराठी और गैरमराठी लोगों के हक में एक ही तरह से धुका रही है। जब प्रबल प्रतिद्वंद्वी उद्धव ठाकरे ने उत्तर भारतीय संघ की रैली में भाग लिया तो राज ने, ‘मैं हिन्दुत्व की चिंता नहीं करता, सिर्फ महाराष्ट्र की करता हूँ’ कह कर प्रकारांतर से भाई को समझौतापरस्त और खुद को मराठा अस्मिता का इकलौता और असली चौकीदार बनाते हुए शिवसेना, एन.सी.पी., सपा और बसपा के संभावित गठजोड़ की आेर तोपों का मुँह मोड़ दिया। जाहिर है कि अपनी चुनावी जीत से बड़ा मुद्दा उनके लिए शिवसेना के नए गठजोड़ और खासकर भाई उद्धव की ताकत को चुनावों में करारी पटखनी दिलवाने का था। पर स्थिति में आज एक और पेंच पैदा हो चुका है। मुंबई शहर में आज गैर-मराठियों के मत मराठियों से अधिक तादाद में हैं। इसीलिए पिछले चुनावों अनुभव समृद्ध बाला साहेब ने हिन्दी-क्षेत्र के भैयाआें के योगदान की सराहना का रास्ता पकड़ा था। और इस बार भी बच्चन पर हमले के मामले में उन्होंने भतीजे के कान खींचने में संकोच नहीं किया और उसके अनुयायियों को बर्ड-फ्लू ग्रस्त चूाा कह डाला। यों अभी भी स्थिति बेहाथ नहीं हुई है। एक तो राज ठाकरे अभी इतने ताकतवर या महान नहीं बने हैं, कि उनकी पुकार पर पूरा महाराष्ट्र अपनी साझा विरासत को ठुकरा कर शेष भारत के खिलाफ एकजुट हो जाए। दूसरे बाजार की ताकतें भी उग्र उपराष्ट्रीयता के खिलाफ हैं। मुंबई की सार्वदेशिकता और मुंबईकारों की राष्ट्रीय छवि को अभी भी बचाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी है कि देश की सारी राजनैतिक पार्टियाँ हलफ उठाएं कि वे आने वाले महीनों में ऐसी अंध उपराष्ट्रीयता का हाथ नहीं थामेंगी। लेकिन ऐसा करने का इच्छुक कोई नहीं दीखता। शिवसेना जब सरेआम कभी वैलेंटाइन डे तो कभी हुसैन की प्रदर्शनी और कभी टी.वी. चैनलों के दफ्तरों में तोड़फोड़ करती है, तो हर सत्तारूढ़ गठजोड़ द्वारा उसे फूल की छड़ी से पीटने का नाटक भर होता है। बाल ठाकरे पार्टी मुखपत्र सामना के सम्पादकीयों में पत्रकारिता की मर्यादाआें को तार-तार कर लोगों पर भद्दे से भद्दे व्यक्ितगत लांछन लगाते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की तो छोड़िए, बॉलीवुड या कापर्ोरेट जगत में से भी कौन बड़ा आदमी खड़ा होकर प्रतिवाद करता है? लालू-मुलायम या संजय निरूपम उत्तर-भारतीयों के पक्षधर बन कर आज अवश्य राज ठाकरे के खिलाफ मुंबई जा रहे हैं, पर पचास से अस्सी तक के दशकों में समाजवादियों के हर धड़े ने ठाकरे और सेना से हाथ मिला कर उसे खूब पाला-पोसा। और कांग्रेस भी इस मुद्दे पर प्राय: तटस्थ ही रही। बेहतर होता महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उजड्ड युवा जब मुंबई में उत्तर प्रदेश के लोगों की सम्पत्ति जला रहे थे, उस वक्त सपा और कांग्रेस के तमाम तथाकथित युवा हृदय सम्राट सीधे मुंबई जाकर अपनी पूरी राजनैतिक ताकत से राज की यूथ ब्रिगेड से भिड़ते। गुजरात में मोदी का उदय और क्रमिक उत्थान ऐसे घटनाक्रमों की बाढ़ के बावजूद बड़े दलों द्वारा अपनाई दुनियादार चुप्पी या उनके गैरदुनियादार आरामकुर्सी छाप प्रतिवादों के चलते ही संभव हुआ है।ं

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